मप्र-राजस्थान और छत्तीसगढ़ में लौट पाएगी कांग्रेस?

2018 में तकरीबन 8 राज्यों में चुनाव होना है. राहुल गांधी डूबती हुई कांग्रेस की कमान संभाले हुए हैंं. सवाल यह है कि वे वर्तमान में कांग्रेस शासित राज्य हैं उन्हें बचा पाएंगे और बीजेपी से उसके किले छीन पाएंगे? गुजरात हारने और हिमाचल से बेदखल होने के बाद कर्नाटक तो गठबंधन में हाथ आया है. लेकिन मप्र और छत्तीसगढ़ में क्या होगा.

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साल 2017 के जाते-जाते चुनाव दर चुनाव मात खाते कांग्रेसियों की मनमाफिक मुराद पूरी हुई. कांग्रेस के कथित युवराज राहुल गांधी की 47 वर्ष की उम्र में अंततः अध्यक्ष पद पर ताजपोशी हुई. वह उपाध्यक्ष पद से बढ़कर अध्यक्ष बनाए गए. इस तरह शतायु कांग्रेस पार्टी की कमान अब नेहरू-गांधी परिवार की पांचवीं पीढ़ी के छठवें सदस्य के हाथों में आ गई.

पार्टीजन अपने नए अध्यक्ष राहुल गांधी से चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठे हैं, किंतु राहुल के हाथों में कोई जादुई छड़ी नहीं है, जिसे घुमाते ही कांग्रेस पार्टी में नवजीवन आ जाए और आगामी चुनावों में उसे धड़ाधड़ सफलता मिलती जाए. वैसे भी पदोन्नत होकर राहुल के हाथों में जो आया है वह टूटे गढ़ और किले हैं जबकि मृत प्रायः बूढ़ी कांग्रेस पार्टी.

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राहुल को ताजपोशी के साथ-साथ गुजरात में पराजय के अलावा हिमाचल भी उसके हाथों से चला गया. अब कुछ राज्य बचे हैं जहां कांग्रेस की सरकार है. उनमें से कर्नाटक छोड़ अन्य राज्य छोटे हैं.

आजादी के बाद अनेक वर्षों तक देश के अधिकतर राज्यों में कांग्रेस ने एकछत्र एकमेव राज किया, किंतु उसके बड़े राज्यों स्थित सभी गढ़ ध्वस्त हो गए हैं या टूट गए हैं. 26 राज्यों में उसकी दुर्गति हो चुकी है, जहां वह वर्षों से सत्ता से बाहर है. उनमें से कई में वह गिरकर तीसरे चौथे एवं पांचवें स्थान पर पहुंच गई है.

कहां कितनी शेष है कांग्रेस
तमिलनाडु में गत 50 वर्षों से कांग्रेस सत्ता से बाहर है. इस राज्य में अब डीएमके एवं एआईएडीएमके का बोलबाला है. पश्चिम बंगाल में 40 सालों से कांग्रेस सत्ता से बेदखल है. अब इस राज्य में तृणमूल, वामपंथी एवं भाजपा है. कांग्रेस अब इन दोनों राज्यों में चौथे पांचवें स्थान पर है.

इधर कांग्रेस 28 साल से उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर है. इस राज्य में अब भाजपा, सपा व बसपा है. बिहार में विगत 27 बरस से कांग्रेस सत्ता से वंचित है. इस राज्य में राजद जदयू एवं भाजपा है. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस चौथे एवं पांचवें स्थान पर है.

यहां भी नहीं रही है साख
बात छोटे एवं मझोले राज्यों की करें तो उनमें भी कांग्रेस की स्थिति बहुत खराब है. त्रिपुरा में वह गत 24 वर्षों से सत्ता से वंचित है. सिक्किम में वह विगत 23 वर्षों से सत्ता से बाहर है.

गुजरात में कांग्रेस गत 22 बरस से सत्ता से दूर है. अब वह आगे 2022 तक यहां सत्ता से दूर रहेगी. इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की हालत बहुत दयनीय है.

 

इसके अलावा उड़ीसा में गत 17 बरस से कांग्रेस सत्ता से दूर है. यहां बीजू जनता दल एवं भाजपा का बोलबाला है. यहां कांग्रेस तीसरे स्थान पर है. झारखंड के  सन 2000 में नए राज्य बनने के बाद यहां 17 बरस से कांग्रेस सत्ता से वंचित है. इस राज्य में भाजपा एवं क्षेत्रीय दलों का बोलबाला है.

मप्र-राजस्थान और छत्तीसगढ़ में लौट पाएगी कांग्रेस?

कांग्रेस इस राज्य में अंतिम क्रम पर है. मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ दोनों राज्य ऐसे हैं जो हिंदीभाषी हैं एवं जहां गत 14 बरस अर्थात् सन 2003 से कांग्रेस सत्ता से दूर है. दोनों राज्य भाजपा के गढ़ हैं जबकि इन दोनों राज्यों में कांग्रेस के दूसरे स्थान पर होने के बाद भी उसकी हालत दयनीय है.

इधर, जम्मू-कश्मीर में गत 8 वर्षों से कांग्रेस सत्ता से दूर है. यहां भाजपा एवं पीडीपी का बोलबाला है. गोवा में गत 5 वर्षों से कांग्रेस सत्ता से दूर है. इस राज्य में भाजपा का बोलबाला है. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की हालत ठीक नहीं है.

उत्तर पूर्व खिसकता चला गया
दिल्ली, नगालैंड एवं राजस्थान में गत 4 वर्ष से कांग्रेस सत्ता से दूर है. दिल्ली में आप एवं भाजपा, नगालैंड में एनपीएफ तथा राजस्थान में भाजपा का बोलबाला है. इन तीनों राज्यों में भी कांग्रेस की हालत ठीक नहीं है.

आंध्र प्रदेश तेलंगाना महाराष्ट्र एवं हरियाणा में गत 3 बरस से कांग्रेस सत्ता से दूर है. आंध्र प्रदेश में टीडीपी, तेलंगाना में टीआरएस तथा महाराष्ट्र एवं हरियाणा में भाजपा का बोलबाला है. इन चारों राज्यों में कांग्रेस खस्ता हाल में है.

कांग्रेस असम, अरुणाचल प्रदेश व केरल की सत्ता से बेदखल हो चुकी है. वह झारखंड, मणिपुर एवं अब हिमाचल प्रदेश की सत्ता से भी वंचित हो चुकी है.

कांग्रेस एक बार जिस राज्य की सत्ता से बाहर होती है, वह वहां दोबारा सत्ता में नहीं आ पाती. ऐसे राज्यों में अब भाजपा या क्षेत्राीय दलों की सरकार बन रही है. ऐसी हालत में कांग्रेस अध्यक्ष की कमान संभालने वाले राहुल गांधी कितने ही हाथ पांव मार लें पर अब कुछ भी हासिल होने से रहा.

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