चंद्रमा को कितना नुकसान पहुंचाते हैं अंतरिक्ष यान?

अहमदाबाद स्थित राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (National Physical Laboratory of India) के साइंटिस्ट ने गणना की है कि जब कोई यान चांद पर उतरता है तो चांद की सतह पर कितने गहरे गड्ढे बनते हैं और कितनी धूल उड़ती है.

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चांद आज भी हमारे लिए कल्पना लोक का हिस्सा है. कविता का वह टुकड़ा जो प्रेमिकाओं और प्रेयसियों की खूबसूरती की तुलना में आज भी आसमान में है. लेकिन विज्ञान की यथार्थ दुनिया में चंद्रमा एक उपग्रह के के रूप में आज पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है और वैज्ञानिकों के लिए रहस्य की चादर लपेटे हुए है.

चंद्रमा के बारे में जानने के लिए ही साल 2008 में इसरो यानी की भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी The Indian Space Research Organisation ने चंद्रयान चंद्रमा पर भेजा, जो आज भी अपना कार्य कर रहा है.

क्या आपको पता है चंद्रमा की खोज में जाने वाले अंतरिक्ष यान चंद्रमा की सतह को कितना नुकसान पहुंचाते हैं.

यान से चंद्रमा पर बनते हैं गड्ढे

अहमदाबाद स्थित राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (National Physical Laboratory of India) के साइंटिस्ट ने गणना की है कि जब कोई यान चांद पर उतरता है तो चांद की सतह पर कितने गहरे गड्ढे बनते हैं और कितनी धूल उड़ती है.

इस गणना का मकसद चांद को कवियों और शायरों के लिए सुरक्षित रखना नहीं बल्कि अवतरण को ज़्यादा सुरक्षित बनाना है.

प्लेनेट स्पेस साइन्स पत्रिका में रिसर्च

एस. के. मिश्रा और उनके साथियों ने अपनी रिसर्च के परिणाम प्लेनेट स्पेस साइन्स नामक रिसर्च मैगजीन प्रकाशित किए हैं. इस रिसर्च के मुताबिक जब कोई यान चंद्रमा पर (या किसी भी ग्रह पर) उतरता है तो वह खूब धूल उड़ाता है.

इसके चलते गड्ढे वगैरह तो बनते ही हैं, सारी धूल जाकर यान के सौर पैनल पर जमा हो जाती है. यान के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत यही सौर पैनल होते हैं जिनकी मदद से सौर ऊर्जा का दोहन होता है. जब इन पर धूल जमा हो जाती है तो ये पैनल ठीक से काम नहीं कर पाते.

चांद पर ये पता लगाया वैज्ञानिकों ने

मिश्रा व उनके साथियों ने इस क्षति की गणना करने के लिए यह देखा कि उतरने से पूर्व यान कितनी देर तक सतह के ऊपर मंडराता है और कितनी ऊंचाई पर मंडराता है. इन दोनों बातों का असर यान के द्वारा उड़ाई गई धूल की मात्रा पर और धूल के कणों की साइज़ पर पड़ता है.

रिसर्चर ने पाया कि मूलत: यान के सतह से ऊपर मंडराने के समय का असर धूल की मात्रा पर पड़ता है. उनकी गणना बताती है कि यदि मंडराने की अवधि को 25 सेकंड से बढ़ाकर 45 सेकंड कर दिया जाए तो धूल की मात्रा तीन गुनी हो जाती है.

चांद के लिए वैज्ञानिकों के सुझाव

इन परिणामों के मद्देनज़र शोधकर्ताओं का सुझाव है कि चांद की सतह पर क्षति को न्यूनतम रखने के लिए बेहतर होगा कि यान के मंडराने का समय कम से कम रखा जाए.

इसके अलावा, उनका यह भी मत है कि अवतरण के समय यान पर ब्रेक लगाने का काम काफी ऊंचाई से ही शुरू कर देना चाहिए और जब यान सतह से 10 मीटर की ऊंचाई पर हो तो ब्रेक लगाना बंद कर देना चाहिए या कम से कम ब्रेक लगाने चाहिए. शोधकर्ताओं के मुताबिक उनके निष्कर्ष चांद पर अवतरण को ज़्यादा सुरक्षित बनाएंगे.

(स्रोत: फीचर्स)

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