Chhath Puja: छठ पूजा की विधि और महत्व? छठ पूजा कैसे मनाई जाती है?

छठ महापर्व चार दिन का होता है (chhath Puja process and steps) और इसकी शुरुआत नहाय खाय से होती है. पहले दिन नहाय-खाय, (nahay khay chhath puja) दूसरे दिन खरना (kharna chhath puja) या लोहंडा, तीसरे दिन सांझा अर्घ्य और आखिरी दिन यानी चौथे दिन सूर्योदय अर्घ्य.

दीपावली (Dipawali) के पंचवर्षीय महापर्व के बाद छठ पर्व (chhath puja) की शुरुआत होती है. देश के पूर्वी भाग मुख्य रूप से बिहार, यूपी और पूर्वांचल में मनाया जाने वाले इस पर्व में सूर्य उपासना (chhath puja surya dev) का महत्व है. यह अब संपूर्ण देश में मनाया जाने लगा है.

छठ पर्व का वैज्ञानिक (chhath puja scientific reason) महत्व भी है. चार दिन तक चलने वाला इस महापर्व की शुरुआत नहाय खाय से होती है.

यह पर्व पौराणिक है और इसे महाभारत और रामायण काल से ही मनाया जाता है. (Chhath Puja Vrat Katha) महाभारत की कथा के अनुसार पांडवों का जब सारा राजपाट जुए में चला गया तो द्रौपदी ने छठ व्रत किया और इससे द्रौपदी की सारी मनोकामनाएं पूर्ण हुईं.

कथा के अनुसार छठी मैया और सूर्य देव की कृपा से पांडव अपना राजपाट हासिल कर पाए. इसके अलावा छठ महापर्व की शुरुआत सूर्य के पुत्र कर्ण द्वारा की गई थी. एक पौराणिक मान्यता के अनुसार कर्ण पानी में खड़े रहकर भगवान सूर्य यानी की अपने पिता को अर्घ्य दिया करते थे. अपने पिता सूर्य की कृपा से ही वे एक महान योद्धा बने और उन्हें कीर्ति मिली.

छठ पूजा का वैज्ञानिक महत्व क्या है? (what is scientific reason of chhath puja)
छठ पूजा का पर्व आस्था का पर्व होने के साथ-साथ एक वैज्ञानिक महापर्व भी है. इस पर्व का सीधा संबंध सूर्य उपासना से है. चूंकि सूर्य की ऊर्जा के कारण ही संपूर्ण पृथ्वी पर जीवन है. हर प्राणी सूर्य के कारण ही चेतनामय है. सूर्य रोग के निवारण करने वाले भी हैं.

ऐसे में सूर्य की उपासना के दौरान सूर्य की रौशनी में छठ के व्रतधारी सीधे संपर्क में आते हैं. बिना अन्न जल ग्रहण किए तीन दिन सूर्य की उपासना में होने से शरीर बाह्य और भीतरी दोनों ही तरह से डिटॉक्सीफाइड होता है यानी की शरीर की गंदगी बाहर होती है. यही नहीं जिस दिन यह पर्व मनाया जाता है वह छठी का दिन होता है.

खगोलीय घटना के अनुसार दिवाली से लेकर भाई दूज यानी की कार्तिक माह की शुरुआत के दौरान सूर्य की पराबैगनी किरणें ज्यादा एकत्रित होती हैं जिससे इस पर्व के माध्यम से उन किरणों से रक्षा भी होती है.

यही नहीं सूर्य उपासना से चर्म रोग तो दूर होते ही हैं बल्कि आंखों की रौशनी भी बढ़ती है. यही वजह है कि छठ पर्व के वैज्ञानिक महत्व को भी अब सामने लाया जाने लगा है.

छठ पूजा व्रत की विधि (how to do chhath puja)
छठ महापर्व चार दिन का होता है (chhath Puja process and steps) और इसकी शुरुआत नहाय खाय से होती है. पहले दिन नहाय-खाय, (nahay khay chhath puja) दूसरे दिन खरना (kharna chhath puja) या लोहंडा, तीसरे दिन सांझा अर्घ्य और आखिरी दिन यानी चौथे दिन सूर्योदय अर्घ्य.

पहले दिन छठ के व्रतधारी स्नान करते हैं और नये कपड़े पहनते हैं. शाकाहारी भोजन करते हैं और परिवार व कुटंब के अन्य सदस्य भी भोजन करते हैं. इस दिन कद्दू भात भी बनाया जाता है.

इसके अतिरिक्त महिलाएं सिंदूर लगाकर साफ सफाई करती हैं. छठ के प्रसाद की तैयारियां की जाती है और पकवान बनाने के लिए रसोई गैस या फिर मिट्ट का चूल्हा बनाया जाता है. व्रत आज आखिरी दिन नमक खाते हैं

खरना क्या होता है? (what is kharna in chhath puja)
छठ पूजा के दूसरे दिन खरना होता है. कार्तिक शुक्ल पंचमी के दिन सारे व्रती शाम को भोजन करते हैं. इसे ही खरना कहा जाता है. कार्तिक शुक्ल पंचमी को पूरे दिन व्रत रखा जाता है.

इस दिन निर्जला व्रत रखा जाता है. व्रत ना तो अन्न ग्रहण करते हैं ना जल. शाम को व्रती भोजन के रूप में चावल व गुड़ की खीर बनाकर ग्रहण करते हैं. इसे खरना कहा जाता है. इस दिन नमक और चीनी का प्रयोग नहीं होता है. इसके अतिरिक्त चावल का पिठ्ठा और घी लगी रोटी खाई व वितरित की जाती है. इसे प्रसाद कहते हैं.

कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से शुरू हुए पर्व का तीसरा दिन षष्ठी कहा जाता है. इस दिन ठेकुआ (thekua recipe) का प्रसाद बनाया जाता है. इसके अलावा चावल के लड्डू भी बनाए जाते हैं. प्रसाद बनने के बाद इन्हें फल के साथ बांस की टोकरी में सजाया जाता है.

इसके बाद टोकरी की पूजा भी होती है और व्रती इसे लेकर सूर्य को अर्घ्य देने के लिए तालाब, नदी या घाट की ओर जाते हैं.

ध्यान देने वाली बात है कि शाम को ही स्नान कर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. आखिरी दिन के बाद अगले दिन यानी की सप्तमी के दिन सूर्योदय की पूरी उपासना फिर से की जाती है और विधिनुसार पूजा करके प्रसाद बांटा जाता है.

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