15 अगस्त 2018: देश आजादी का जश्न मना रहा था तब कहां थे गांधी?

15 अगस्त 1947 को देश जब आजाद हुआ तो नेहरु और सरदार पटेल ने गांधी जी को स्वतंत्रता दिवस के जश्न में शामिल होने के लिए पत्र लिखा. लेकिन गांधी जी आजादी के जश्न में शामिल नहीं हुए. दरअसल वे दिल्ली में थे ही नहीं.

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दक्षिण अफ्रीका से 1915 में भारत लौटे महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई के समानांतर सामाजिक सुधार को अहम माना. यही वजह थी कि उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत से सीधी जंग करने से पहले अपने राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले की सलाह पर देश का भ्रमण किया. गांव-गांव और कस्बे कस्बे घूमे. समाज और उसकी समस्याओं को समझा. उस आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक समता-विषमता को समझा जो भारत को राष्ट्र बनाती थी.

गांधी के लिए भारतीय समाज

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बहरहाल, गांधी अपने पूरे राजनीतिक और सामाजिक सार्वजनिक जीवन में सत्ता से दूर समाज और समाज के भीतर बह रहे उस राष्ट्र के लिए जीते रहे जिसमें उनके सपनों का भारत बसता रहा.

हिंदू-मुसलमान एक हों, दंगे रुके और समाज में सहिष्णुता और समरसता बनी रहे. सत्ता गांधी के लिए एक हस्तांतरण भर था. यही वजह थी कि जिस दिन भारत को आजादी मिली गांधी ना तो आजादी के जश्न में शामिल हुए और ना ही संसद में मौजूद थे. दरअसल, बंटवारेे के आधार पर मिली आजादी गांधी को मंजूर नहीं थी.

15 अगस्त 1947 में आजादी के जश्न में कहां थे गांधी

दरअसल, जिस दिन भारत आजाद हुआ उस वक्त गांधी जी दिल्ली डिस्ट्रिक्ट से तकरीबन हजार किलोमीटर दूर नोआखली, बंगाल में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हो रही सांप्रदायिक हिंसा को रोकने और रोज़ हो रही मौतों पर काबू पाने के लिए अनशन पर बैठे थे. वे उसी सामाजिक समरसता को एक करने की कोशिश कर रहे थे जिसका जरिया उनकी राजनीतिक लड़ाई बनीं थी. 

बंगाल में दंगों की आग बुझा रहे थे गांधी

नोआखाली में हिन्दुओं-मुसलमानों के बीच भाईचारा कायम करने के लिए गांधी जी गांव-गांव घूम रहे थे. उनके पास धार्मिक पुस्तकें ही थीं जो वे बांट रहे थे और लोगों को समझा रहे थे. उन्होंने सभी हिन्दुओं और मुसलमानों से शांति बनाए रखने की अपील की. उन्होंने दंगाइयों को शांत करने की कोशिश की और उन्हें शपथ दिलाई कि वे एक-दूसरे की हत्याएं नहीं करेंगे.

क्यों आजादी के जश्न में नहीं थे गांधी?
देश के आजाद होने का दिन 15 अगस्त जब वल्लभ भाई पटेल और जवाहर लाल नेहरू ने तय किया तो उन्होंने महात्मा गांधी को एक पत्र भी लिखा जिसमे उन्होंने पहले स्वतन्त्रता दिवस की तारीख 15 अगस्त बताया.

पत्र में उन्होंने लिखा था कि- आप राष्ट्रपिता हैं और भारत की स्वतंत्रता के इस ख़ास अवसर पर आप जरूर शामिल हों और अपना आशीर्वाद दें.

लेकिन इसके जवाब में गांधी जी ने लिखा था- जब हिंदू-मुस्लिम कलकत्ता मे एक दूसरे की जान के दुसमन बने पड़े है तो फिर ऐसे में मैं भला जश्न कैसे मना सकता हूं. और साथ ही उन्होंने यह भी लिखा के इस दंगे को रोकने के लिए मै अपने जान भी दे सकता हूं.

Image source: Wikipedia
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गांधी का आजादी के जश्न में नहीं शामिल होने का निर्णय सदा के लिए भारतीय इतिहास में दर्ज हो गया. विश्व इतिहास में ऐसा अपने कर्तव्य का ऐसा ईमानदार उदाहरण कभी नहीं मिला.

आजीवन गांधी ने जिन सिद्धांतों को जिया, समझा और आचरण में उतारा वे उनके अंतिम समय तक उनके साथ बने रहे.

गांधी का राजनीतिक चिंतन बेहद व्यापक और विशाल था. गांधी के लिए राष्ट्र का अर्थ केवल व्यवस्था और राजनीति नहीं थी बल्कि समाज के भीतर रह रहा वह जनमानस था, जिससे मिलकर राष्ट्र नामक ईकाई का निर्माण होता था. गांधी उसी सामाजिक ईकाई को बनाने के लिए आजीवन अनशन, आंदोलन करते रहे.

गांधी जी के आंदोलन

गांधी के सारे आंदोलन समाज के हर स्तर को एक दूसरे से जोड़ते रहे और पूरे समाज को राष्ट्र से. सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक काननू तोड़ने के लिए दांड़ी यात्रा, भारत छोड़ो आंदोलन सहित कई आंदोलन जाति, अस्पृश्यता और समय-समय धार्मिक अंधविश्वास, सांप्रदायिकता जैसे बुनियादी मुद्दे उनकी आजादी की लड़ाई के केंद्र में रहे.

गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की वह रौशनी है जिसके उजाले में हमारा आजादी का इतिहास आज भी रौशन होता है.