मिथुन लग्न में ग्रहों की स्थिति, सारगर्भित विवेचना

आकाश में 60 डिग्री से 90 डिग्री तक के भाग को मिथुन राशि (Mithun rashi lagna) के नाम से जाना जाता है. यानि जो आकाश के इस समय के अनुसार पैदा हुआ हो वो मिथुन राशि के अंर्तगत आता है. मिथुन राशि का तत्व वायु है और इनका स्वामी बुध है. ये प्रायः दो तरह के व्यक्त्वि होते हैं. कुछ लोग मजाकिया और मिलनसार होते हैं जबकि कुछ गंभीर विचारों वाले होते हैं.

आकाश में 60 डिग्री से 90 डिग्री तक के भाग को मिथुन राशि (Mithun rashi lagna) के नाम से जाना जाता है. यानि जो आकाश के इस समय के अनुसार पैदा हुआ हो वो मिथुन राशि के अंर्तगत आता है. मिथुन राशि का तत्व वायु है और इनका स्वामी बुध है. ये प्रायः दो तरह के व्यक्त्वि होते हैं. कुछ लोग मजाकिया और मिलनसार होते हैं जबकि कुछ गंभीर विचारों वाले होते हैं.

मिथुन लग्न में चंद्र (Mithun lagna me chandra)

मिथुन लग्न में चंद्र द्वितीय भाव का स्वामी होता है. ये जातक के माता, भूमि, भवन, वाहन, मित्र, साझेदार, शांति, जल, जनता, स्थायी संपत्ति, दया, परोपकार, छल, कपट, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थों का सेवन, संचित धन, झूठा आरोप, अफवाह, प्रेम विवाह, प्रेम संबंध के बारे में बताता है. यदि आपका चंद्र शक्तिशाली स्थान पर है तो इन संदर्भों मंे आपको संतुष्टि मिलती है.

मिथुन लग्न में सूर्यं (Mithun lagna me surya)

मिथुन लग्न में सूर्य तीसरे भाव का अधिपति होता है. ये नौकर-चाकर, सहोदर, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्यूटर, अकाउंट्स, मोबाइल, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, खांसी, योगाभ्यास, दासता, आदि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. मिथुन राशि के जातकों को अपने यश का झंडा फहराने के लिए ये जरूर देखना चाहिए कि क्या उनकी राशि में सूर्य शक्तिशाली स्थान पर है या नहीं.

मिथुन लग्न में मंगल (Mithun lagna me mangal)

मिथुन लग्न में मंगल छठे और ग्यारहवे भाव का अधिपति है. छठे स्थान का अधिपति होने के कारण मंगल बीमारी, कर्ज, अपमान, शत्रु, चिंता, शंका, पीड़ा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी, साहूकारी का प्रतिनिधित्व करता है. वहीं इसके ग्यारहवे स्थान के अधिपति होने के कारण यह लोभ, लाभ, गुलामी, संतान हीनता, कन्या संतति, रिश्तेदार, रिश्वतखोरी, बेईमानी जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है.

मिथुन लग्न में शुक्र (Mithun lagna me shukra)

मिथुन लग्न में शुक्र पांचवे और बारहवे स्थान का अधिपति होता है. पांचवे स्थान का अधिपति होने के कारण ये बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की शक्ति, नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध व्यवस्था, भगवान की भक्ति, देश भक्ति, धन मिलने के उपाय, अचानक धन की प्राप्ति, व्रत आदि के लिए जिम्मेदार होता है. वहीं इसके बारहवे स्थान के अधिपति होने के कारण ये निद्रा, यात्रा, हानि, दान, दंड, लंपटगिरी, परस्त्री गमन और व्यर्थ भ्रमण का प्रतिनिधित्व करता है.

मिथुन लग्न में बुध (Mithun lagna me budh)

मिथुन लग्न में बुध प्रथम भाव का अधिपति होता है. बुध शारीरिक रूप, जाति, चिन्ह, आयु, दुख-सुख, विवेक, मस्तिष्क, व्यक्ति का स्वभाव, संपूर्ण व्यक्तित्व को तय करता है. अगर आपको अपने जीवन में इन सभी बातों के बारें में जानना है तो अपनी कुंडली में बुध के स्थान का अध्ययन करना चाहिए. इसकी बलवान स्थिति अति शुभ फल देती है.

मिथुन लग्न में गुरू (Mithun lagna me guru)

मिथुन लग्न में गुरू सातवे भाव का अधिपति होता है. ये लक्ष्मी, स्त्री, कामवासना, चोरी, झगड़ा, अशांति, उपद्रव, अग्निकांड जैसे विषयों के लिए जिम्मेदार होता है. गुरू की बलवान स्थिति आपको आपकी राशि में अति शुभ फल देती है और कमजोर स्थिति अशुभ फल देती है.

मिथुन लग्न में शनि (Mithun lagna me shani)

मिथुन लग्न में शनि आठवे और नवे भाव का अधिपति होता है. इसके आठवे स्थान के अधिपति होने के कारण ये व्याधि, जीवन, आयु, मृत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचारधारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, जेल यात्रा, अस्पताल, भूत, प्रेत, जादू आदि के लिए जिम्मेदार होता है. वहीं इसके नवे स्थान के अधिपति होने के काराण यह धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, भाग्योदय, प्रवास, पिता का सुख, दान आदि विषयों के लिए जिम्मेदार होता है.

मिथुन लग्न में राहु (Mithun lagna me rahu)

मिथुन लग्न में राहु चैथे भाव का स्वामी होता है. चैथे स्थान का अधिपति होने के कारण यह भूमि, भवन, वाहन, मित्र, साझेदार, शांति, जल, जनता, स्थायी संपत्ति, दया, परोपकार, छल, कपट, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थों का सेवन, झूठा आरोप, अफवाह, प्रेम संबंध जैसी चीजों के लिए जिम्मेदार होता है. इन चीजों में शुभ फल के लिए राहु की स्थिति बलवान होनी चाहिए.

मिथुन लग्न में केतु (Mithun lagna me ketu)

मिथुन लग्न में केतु दसवे भाव का अधिपति होता है. दसवे स्थान का अधिपति होने की वजह से यह राज्य, मान, प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, हवन, अनुष्ठान, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतृत्व, विदेश यात्रा, पैतृक संपत्ति, जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है.

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