Rajasthan Cabinet Reshuffle: राजस्थान के बहाने ही सही, क्या कांग्रेस खुद में बदलाव लाएगी?

क्या कांग्रेस पार्टी अपने अंदर भी एक बदलाव लाने की तैयारी करेगी? क्या पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने जैसे सचिन पायलट को संतुष्ट किया वैसे ही वह अपने भीतर घूम रही असंतुष्टों, निराश हो चुके लोगों को मनाने और उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास करेगी?

मैं पार्टी की ओर से किसी भी तरह की जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हूं. हम 2023 के चुनावों को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर सरकार बनाएंगे. सभी को मिलकर ऑल इंडिया लेवल पर और राजस्थान के लेवल पर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के लिए काम करना पड़ेगा.  सचिन पायलट                  

राजस्थान में 15 नये मंत्री चेहरों की शपथ के साथ हुए कैबिनेट विस्तार के बीच सचिन पायलट का यह बयान बताता है कि  अशोक गहलोत के बाद राजस्थान की सियासत का यह सबसे बड़ा चेहरा इस साल जुलाई माह में गहलोत गुट के साथ चल रही गुटबाजी और रस्साकशी से उबर रहा है और एक नई भूमिका के लिए तैयार है. इस युवा नेता के भीतर  पार्टी में अपनी बात मनवाकर और अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का आत्मविश्वास भी साफ नजर आ रहा है.

दरअसल, राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार में 3 साल बाद हुआ यह कैबिनेट विस्तार राज्य में कांग्रेस के अंदरखाने चल रही गुटबाजी को किसी हद तक थामने की कवायद लगती है. हालांकि मंत्रिमंडल विस्तार के बीच अशोक गहलोत खेमे के मंत्रियों द्वारा सीएम का वॉट्सएप ग्रुप छोड़ने और नाराजगी की खबरें सामने आई हैं, लेकिन छोटी-मोटी असंतुष्टि की खबरों को दरकिनार किया जाए तो  मंत्रिमंडल में हुए बदलाव से युवा नेता सचिन पायलट संतुष्ट दिखाई दे रहे हैं और उनकी यह संतुष्टि किसी और के लिए तो नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी के लिए राजस्थान की ओर से एक राहत भरी खबर होगी.

बहरहाल, 2022 के सात राज्यों के चुनाव और 2023 में राजस्थान के चुनाव और 2024 में लोकसभा के चुनावों में सचिन पायलट की भूमिका क्या होगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन राजस्थान में हुआ यह बदलाव इस बात की ओर इशारा जरूर देता है कि कांग्रेस पार्टी के भीतर भी अब एक बदलाव की जरूरत है और ये  बदलाव बहुत कांग्रेस पार्टी में बदलाव बहुत सारी चीजों में सुधार ला सकता है चाहे वह सरकारों के भीतर हो अथवा पार्टी और संगठन के भीतर.

दरअसल, किसी भी पार्टी में नये चेहरों को भाव देना, उनकी उपादेयता, उपयोगिता और उन्हें काम करने का अवसर देना ही पार्टी से लेकर संगठन तक को मजबूत बनाता है. अनुभवी नेताओं को एक समय सीमा में संगठन में काम करने के लिए भेजना और युवा ऊर्जा से भरे चेहरों को सरकारों के भीतर काम करने की आजादी देना पार्टी में एक प्रवाह को बनाना भी होता है. बात फिर कांग्रेस जैसी पार्टी के लिए हो तो यह तो पार्टी के हालिया अतीत को देखते हुए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि कांग्रेस अब अपने शीर्ष नेतृत्व, संगठनात्मक ढांचे में भी बदलाव के लिए तैयार हो जाए.

देखा जाए तो बीते कुछ समय में कांग्रेस पार्टी नेतृत्व के संकट से जूझ रही है. पार्टी का अध्यक्ष गांधी परिवार से होना, नये लोगों को तवज्जो ना मिलना, पुराने मजबूत और सालों काम कर चुके नेताओं को ठीक से सम्मान और जगह ना मिल पाना, सालों से पदों पर बैठे लोगों को ना बदलना और संगठन में एक जैसी काम करने की नीति ने कांग्रेस पार्टी के भीतर अंसतुष्टों, नाराज, दुखी, हारे हुए और निराश हुए लोगों की लंबी कतार खड़ी कर दी है.

2014 के बाद ऐसे कई बड़े चेहरे हैं जिन्होंने पार्टी को अलविदा कहा है तो वहीं पार्टी के खिलाफ सीधे बगावती तेवर दिखाए हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे कद्दावर युवा नेता का कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल होना ही इसकी बानगी है कि पार्टी के अंदर युवा चेहरों और सालों से काम कर रहे निष्ठावान कार्यकर्ताओं को ना सम्मान मिल रहा है और ना ही काम करने का अवसर. आए दिन कांग्रेस शासित राज्यों में उठापटक और नेताओं में अंदरखाने खींचतान की खबरें आम हो चली हैं.

क्या कांग्रेस को नहीं लगता है कि इस पर सोचा जाना चाहिए? कपिल सिब्बल से लेकर गुलाम नबी आजाद जैसे तमाम ऐसे नेता हैं जो कभी मुखर तो कभी खामोशी से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से गुबार पाले हुए हैं, यदि पार्टी ने सचिन पायलट जैसेे नेता  को  संतुष्ट कर राजस्थान में हालात संभाले हैं तो फिर फिर सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और राहुल गांधी को पार्टी के अंदर भी नाराज, निराश और असंतोषी नेताओं की भावना समझनी चाहिए.
क्या कांग्रेस यह बदलाव ला पाएगी?  

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