भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर है सुनील दत्त की “यादें”

सिनेमा के हरएक दौर में फिल्म मेकिंग और प्रस्तुतिकरण को लेकर नित नए प्रयोग होते रहे हैं. देश में ऐसा ही एक प्रयोग साल 1965 में फिल्म "यादें" में किया गया. इस पूरी फिल्म में सुनील दत्त अकेले ही किरदार थे. एकल किरदार को लेकर हॉलीवुड और बॉलीवुड में अपने तरह की यह पहली फिल्म थी. 

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सिनेमा के हर एक दौर में फिल्म मेकिंग और प्रस्तुतिकरण को लेकर नित नए प्रयोग होते रहे हैं. देश में ऐसा ही एक प्रयोग साल 1965 में फिल्म “यादें” में किया गया. इस पूरी फिल्म में सुनील दत्त अकेले ही किरदार थे. एकल किरदार को लेकर हॉलीवुड और बॉलीवुड में अपने तरह की यह पहली फिल्म थी. 

एक सितारे के कंधे पर फिल्म का भार 

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परदे पर जब दर्शकों के सामने एक ही व्यक्ति होता है तो स्पष्ट रूप से सारा ध्यान उसी पर केंद्रित रहता है. फिर जरूरी नहीं होता कि वह कोई जाना-पहचाना चेहरा ही हो और यदि ऐसा होता है तो दर्शकों की उत्सुकता और आकर्षण उसको लेकर निश्चित रूप से बढ़ जाता है.

गुजरे समय में हमने दर्जनों अभिनेताओं से भरी ‘मल्टी स्टारर’ फिल्मों का दौर तो देखा ही है साथ ही स्टार सिस्टम भी हमारे सामने ही अस्तित्व में आया है. इंड्रस्टीज का 20 से 30 साल पुराना इतिहास देखें तो ऐसी कई फ़िल्में उदाहरण के रूप में हमारे सामने हैं जिनमें एक सितारे के कंधे पर पूरी फिल्म को सफल बनाने का दबाव रहा है.

एकल अदाकारी का उदाहरण है “यादें”

सिनेमा में फिल्म मेकिंग और प्रस्तुतिकरण को लेकर होने वाले प्रयोगों में साल 1965 में सुनील दत्त द्वारा अभिनीत और निर्देशित फिल्म ‘यादें’ मिल का पत्थर है. यह फिल्म इस लिहाज से अनूठी थी कि सुनील दत्त पूरी फिल्म में इकलौते किरदार थे. पूरी फिल्म में उनके अलावा अन्य कोई चरित्र नहीं था.

क्या थी कहानी 

फिल्म का कथानक कुछ इस तरह था कि एक व्यक्ति को घर लौटने के बाद महसूस होता है कि उसकी पत्नी और बेटा उसे छोड़ गए हैं. वह खुद से एकालाप करता है कि यह उसका भ्रम है और वे लोग जल्द ही लौट आएंगे. निराशा, पराभव और पश्चाताप के मनोभावों को सुनील दत्त ने अपने अभिनय से इस फिल्म में जीवंत किया था.

नेशनल अवॉर्ड और गिनीज़ बुक में नाम  

ब्लैक एंड वाइट के दौर में बनी ‘यादें’ में ध्वनि प्रकाश और अंधेरे के संयोजन से मनोभावों को उकेरा गया था. कोई आश्चर्य नहीं कि साल 1964 का “नेशनल अवार्ड” ‘यादें’ अपने अनूठेपन की ही वजह से कमा पाई थी. इस तरह की पहली फिल्म होने की वजह से ‘गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में भी दर्ज हुई.

हॉलीवुड को भी मिली प्रेरणा 

“यादें” बनने के बाद हॉलीवुड को एकल अभिनय पर फिल्म बनाने की प्रेरणा मिली और दर्जनों बेहतरीन फिल्में बनाई गई. विश्वविख्यात अभिनेत्री ‘इंग्रिड बर्गमन’ अभिनीत द ह्यूमन वॉइस (1966), द नोह (1975), सीक्रेट ऑनर (1984), गेस एनाटोमी (1996 ), कास्ट अवे (2000), आई एम लीजेंड (2007), मून (2009), 127 अवर (2010) और ग्रेविटी (2013) कुछ उल्लेखनीय फिल्में हैं. 

कन्नड़ फिल्म “शांति” का नाम गिनीज बुक 

साल 2005 में कन्नड़ फिल्म ‘शांति’ एकल नायिका वाली दूसरी फिल्म बनी. इस फिल्म को गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में “यादें” के बाद दूसरा स्थान दिया गया. बारागुरु रामचन्द्रप्पा लिखित और निर्देशित शांति में कन्नड़ अभिनेत्री भावना ने अभिनय किया था.

“कर्मा” भी रही चर्चा में 

इकलौते किरदार की श्रेणी में एक कदम आगे बढ़कर प्रयोग किया गया तमिल फिल्म ‘कर्मा’ (2015) में. मर्डर मिस्ट्री पर आधारित इस सस्पेंस थ्रिलर का टाइटल सिर्फ एक लाइन का है. फिल्म के लेखक, निर्माता, निर्देशक और अभिनेता आर अरविन्द हैं.

इस पूरी फिल्म में एक घंटे की बातचीत वाले कथानक में केवल दो ही पात्र दिखाई देते हैं. ये दोनों ही भूमिकाएं अभिनेता आर अरविन्द ने निभाई हैं. साल 2016 में मेड्रिड फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म को विशेष रूप से सम्मानित किया गया था.