Research: हैफ्नियम हाइपर सोनिक मिसाइल को बनाएगा और मजबूत  

अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा की ओर से हाल ही में लांच किया गया अंतरिक्ष यान "पार्कर सोलर प्रोब" सूरज के सबसे नजदीक पहुंचने वाला पहला अंतरिक्ष यान होगा. इस दिशा में अंतिरक्ष विज्ञानियों की कई टीमें रिसर्च करने में जुटी हुई हैं.

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अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा की ओर से हाल ही में लांच किया गया अंतरिक्ष यान “पार्कर सोलर प्रोब” सूरज के सबसे नजदीक पहुंचने वाला पहला अंतरिक्ष यान होगा. इस दिशा में अंतिरक्ष विज्ञानियों की कई टीमें रिसर्च करने में जुटी हुई हैं.

और भी मजबूत बनेंगे हाइपर सोनिक वाहन

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ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने भी एक ऐसे पदार्थ की खोज की है जो लगभग 4000 डिग्री सेल्सियस तापमान सहन कर सकता है. इस तरह की रिसर्च अंतरिक्ष में तेज रफ्तार से पहुंचने वाले हाइपर सोनिक वाहन और भी मजबूत बन सकेंगे.

सर्वाधिक है हैफ्नियम कार्बाइड का गलनांक

ब्रिटेन के इम्पीरियल काॅलेज के वैज्ञानिकों की खोज में हैफ्नियम कार्बाइड का गलनांक सबसे अधिक निकला है. दरअसल टैंटेलम कार्बाइड और हैफिनयम कार्बाइड रिफ्रैक्ट्री सिरेमिक्स हैं और यह ऊष्मा के प्रतिरोधी होने के कारण बहुत अधिक ऊष्मा को सहन कर सकते हैं.

हाइपर सोनिक मिसाइल बनाने के लिए भी इसी तरह के पदार्थ की जरूरत होती है. जो ज्यादा से ज्यादा गर्मी बर्दास्त कर सकें. इसके अलावा परमाणु रिएक्टर के बेहद गर्म वातावरण में भी ईंधन के आवरण के तौर पर भी इस पदार्थ का उपयोग किया जा सकता है.

लेजर की मदद से इज़ाद की तकनीक 

टैंटेलम कार्बाइड और हैफिनयम कार्बाइड दोनों पदार्थ का गलनांक का पता करने रिसर्च लैब में प्रौद्योगिकी नहीं होने से वैज्ञानिकों ने इन दोनों यौगिकों की गर्मी सहन करने की क्षमता को जांचने के लिए लेजर का इस्तेमाल किया. जिससे तीक्ष्ण गर्मी पैदा करने वाली एक नई टेक्नीक विकसित की गई.

क्या रहा रिसर्च का रिजल्ट 

रिसर्च में पाया गया कि दोनों यौगिकों को मिश्रित कर दिया जाए तो उनका गलनांक 3905 डिग्री सेल्सियस था. वहीं दोनों यौगिकों को अलग-अलग गर्म करने पर इनके गलनांक भी अलग-अलग पाए गए. जो कि पहले वाले गलनांक से ज्यादा थे.

टैंटेलम कार्बाइड 3768 डिग्री सेल्सियस पर पिघल गया. जबकि हैफ्नियम 3958 डिग्री सेल्सियस पर पिघला. जो कि अपने आप में ही एक रिकाॅर्ड है. क्योंकि कोई अन्य पदार्थ अभी तक इतने अधिक ताप को सहन नहीं कर पाए हैं. इस तरह से अब हाइपर सोनिक वाहन बनाने में वैज्ञानिकों को मदद मिलेगी.