वृश्चिक लग्न में ग्रहों की स्थिति, सारगर्भित विवेचना

आकाश में 210 डिग्री से लेकर 240 डिग्री तक के भाग को वृश्चिक राशि (vrishchik lagna) कहा जाता है. जिस जातक के जन्म के समय यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है उस जातक का लग्न वृश्चिक (vrishchik rashi) होता है. वृश्चिक राशि एक जल तत्व वाली राशि है. इस राशि का स्वामी प्लूटो है. इस राशि के लोग चतुर, बहादुर, जिद्दी तथा सच्चे मित्र होते हैं.

आकाश में 210 डिग्री से लेकर 240 डिग्री तक के भाग को वृश्चिक राशि (vrishchik lagna) कहा जाता है. जिस जातक के जन्म के समय यह भाग आकाश के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है उस जातक का लग्न वृश्चिक (vrishchik rashi) होता है. वृश्चिक राशि एक जल तत्व वाली राशि है. इस राशि का स्वामी प्लूटो है. इस राशि के लोग चतुर, बहादुर, जिद्दी तथा सच्चे मित्र होते हैं.

वृश्चिक लग्न में चंद्र (vrishchik lagna me chandra)

वृश्चिक लग्न में चंद्र नवम भाव का अधिपति होता है. नवम भाव का अधिपति होने के कारण चंद्रमा जातक के जीवन में धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्ममा, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, पिता का सुख, तीर्थ यात्रा, दान, इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. आपकी कुंडली में यदि चंद्र बलवान है तो आपको उपरोक्त विषयों में शुभ फल प्राप्त होगा.

वृश्चिक लग्न में सूर्य (vrishchik lagna me surya)

वृश्चिक लग्न में सूर्य दसवे भाव का अधिपति है. दसवे भाव का अधिपति होने की वजह से सूर्य जातक के जीवन में राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतृत्व, विदेश यात्रा, पैतृक संपत्ति जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. उपरोक्त विषयों की जानकारी के लिए कुंडली में सूर्य की स्थिति का अध्ययन अवश्य करवाएं.

वृश्चिक लग्न में मंगल (vrishchik lagna me mangal)

वृश्चिक लग्न में मंगल पहले और छठे भाव का अधिपति होता है. पहले भाव का अधिपति होने के कारण मंगल जातक के रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख-दुख, विवेक, मस्तिष्क, व्यक्ति के स्वभाव, आकृति और उसके संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है. मंगल के छठे भाव के अधिपति होने के कारण वह बीमारी, कर्ज, दुश्मन, चिंता, शंका, पीड़ा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी, साहूकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, अच्छा या बुरा व्यसन जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है.

वृश्चिक लग्न में बुध (vrishchik lagna me budh)

वृश्चिक लग्न में बुध अष्टम भाव का अधिपति होता है. आठवे भाव के अधिपति होने के कारण बुध जातक के जीवन में व्याधि, जीवन, आयु, मृत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचारधारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, जेलयात्रा, अस्पताल, भूत-प्रेत, जादू-टोना जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है.

वृश्चिक लग्न में गुरु (vrishchik lagna me guru)

वृश्चिक लग्न में गुरु दूसरे भाव का अधिपति होता है. दूसरे भाव का अधिपति होने के कारण बृहस्पति जातक के कुल, आंख, नाक, कान, गला, स्वर, आभूषण, सौंदर्य, गायन कुटुंब का प्रतिनिधित्व करता है. आपकी कुंडली में अगर बृहस्पति बलशाली है तो ये आपको काफी शुभ फल देगा अगर नहीं है तो आपको ये अशुभ फल देगा.

वृश्चिक लग्न में शुक्र (vrischik lagna me shukra)

वृश्चिक लग्न में शुक्र सातवे और बारहवे भाव का अधिपति होता है. सातवे भाव का अधिपति होने के कारण शुक्र जातक के जीवन में स्त्री, कामवासना, चोरी, झगड़ा, अशांति, उपद्रव, अग्निकांड जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. वहीं बारहवे भाव का अधिपति होने के कारण वह निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लंपटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है.

वृश्चिक लग्न में शनि (vrishchik lagna me shani)

वृश्चिक लग्न में शनि तीसरे और चैथे भाव का अधिपति होता है. तीसरे भाव का अधिपति होने के कारण शनि जातक के जीवन में नौकर, चाकर, सहोदर, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्यूटर, मोबइल, अकाउंट्स, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, दासता, योगाभ्यास जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. वहीं चैथे भाव का अधिपति होने के कारण शनि भूमि भवन, वाहन, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपत्ति, दया, परोपकार, छल-कपट, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थों का सेवन, धन संचय, झूठा आरोप, अफवाह, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है.

वृश्चिक लग्न में राहु (vrischik lagna me raahu)

वृश्चिक लग्न में राहु ग्यारहवे भाव का अधिपति होता है. ग्यारहवे भाव का अधिपति होने के कारण राहु जातक के जीवन में लोभ, लाभ गुलामी, संतान हीनता, कन्या संतति, रिश्तेदार, रिश्वतखोरी, बेईमानी जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. इन विषयों में जातक को अच्छे और शुभ फल तभी मिल सकते हैं जब राहु की स्थिति बलशाली हो.

वृश्चिक लग्न में केतु (vrischik lagna me ketu)

वृश्चिक लग्न में केतु पांचवे भाव का अधिपति होता है. पांचवे भाव का अधिपति होने के कारण केतु जातक के जीवन में बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की क्षमता, शक्ति नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध कुशलता, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायास धन मिलने की संभावना, व्रत, पुत्र संतान, स्वाभिमान, अंहकार आदि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है.

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