Research: अब मकड़ी के जालों से होगा कैंसर का ट्रीटमेंट

आमतौर पर हम मकड़ी जैसे कीड़ों को अपने घरों में देखना भी पसंद नहीं करते हैं. अक्सर घर में मकड़ी का जाला देखते ही हम उसकी सफाई कर देते हैं. लेकिन क्या आपने सोचा है कि यही मकड़ी का जाला अब हमें कैंसर जैसी घातक बीमारी से लड़ने में हैल्प करेगा.

आमतौर पर हम मकड़ी जैसे कीड़ों को अपने घरों में देखना भी पसंद नहीं करते हैं. अक्सर घर में मकड़ी का जाला देखते ही हम उसकी सफाई कर देते हैं. लेकिन क्या आपने सोचा है कि यही मकड़ी का जाला अब हमें कैंसर जैसी घातक बीमारी से लड़ने में हैल्प करेगा. शोधकर्ताओं ने मकड़ी के जाले से ऐसे कैप्सूल तैयार किए हैं, जो कि कैंसर से लड़ने में हमारी मदद करेगा.

रिसर्च में आए चौकाने रहा वाले रिजल्ट

वैज्ञानिकों ने कैंसर से लड़ने की दवा तैयार करते समय मकड़ी पर प्रयोग किए. इस रिसर्च के दौरान उन्हें चौकाने वाले परिणाम मिले. रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने मकड़ी के जाले से बने महीन कैप्सूल में वैक्सीन भरकर उसे मानव के इम्यून सिस्टम की कोशिकाओं तक पहुंचाया.

इसका रिजल्ट यह रहा कि शरीर में जिस तेजी से कैंसर की कोशिकाएं बढ़ती हैं, उसी तेजी से इम्यून सिस्टम की कोशिकाएं बढ़कर कैंसर की कोशिकाओं को खत्म कर देती हैं. यदि वैज्ञानिक इस प्रयोग में पूरी तरह सफल रहे तो कैंसर जैसी बीमारियों से निजात पाना संभव हो जाएगा.

जाने शरीर में कोशिका तंत्र का काम

हमारे शरीर के कोशिका तंत्र की बात करें तो यह शरीर को स्वस्थ बनाए रखने की जिम्मेदारी इम्यून सिस्टम के दो तरीकों पर निर्भर करती है. एक तरीका जिसे सेल मेडिएटेड कहते हैं. जिसमेें टी-कोशिकाएं रोगाणुओं को मारती हैं. वहीं दूसरे तरीके को हृयूमोरल कहते हैं. इसमें बी कोशिकाएं होती हैं, जो कि प्लाजमा कोशिकाओं का उत्पादन करती हैं. जो एंटीबाॅडी बनाकर रोगाणुओं को खत्म कर देती हैं.

कैसे बनते हैं माइक्रो कैप्सूल

कैंसर ट्यूमर को खत्म करने के लिए मकड़ी के जाले में मौजूद रेशम प्रोटीन से कैप्सूल को तैयार किया जाता है. इस रिसर्च के लिए वैज्ञानिकों ने आमतौर पर पाई जाने वाली एरेनियस डायाटेमेटस मकड़ी का उपयोग किया. इस मकड़ी के धागे प्रतिरोधी और जहरीले नहीं होते हैं.

इन जालों को रिसर्च लैब में डेवलप किया गया. मकड़ी के जाले से रेशम को तैयार कर इसको पेप्टाइड में लपेटा गया. बाद में टी-कोशिकाओं के अंदर जा सकने वाले माइक्रो कैप्सूल तैयार किए गए. यह रिसर्च बहुत ही कारगर साबित हुई है.

टेम्परेचर में भी असरदार रहेगी दवा

वैसे तो सभी दवाओं को ठंडे वाताावरण में रखने की जरूरत होती है, लेकिन इस दवा को कोल्ड स्टोरेज की भी जरूरत नहीं है. इस दवा को यदि कई घंटों तक 100 डिग्री सेल्सियस टेम्परेचर में भी रखा जाए, तो भी यह असरदार बनी रहती है. इसलिए दवा को ज्यादा दूर तक ले जाने के लिए कोई खास मशक्क्त नहीं करनी होगी.

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