बिहार: आस्था के अलग रंग हैं कहलगांव के शांतिधाम पहाड़ में

बिहार स्थित भागलपुर से करीब 30-40 किलोमीटर पूर्व में गंगा के किनारे एक छोटा सा शहर है कहलगांव. यह गांव तांत्रिकों की साधना के लिए बहुत ही प्रसिद्ध रहा है.

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बिहार स्थित भागलपुर से करीब 30-40 किलोमीटर पूर्व में गंगा के किनारे एक छोटा सा शहर है कहलगांव. कहते हैं कि कोई कहल नामक ऋषि यहां रहते थे और उन्हीं के नाम पर यह शहर बसा. आजकल यह शहर चर्चाओं में रहता है क्योंकि यहां एनटीपीसी ने अपना प्लांट स्थापित किया है. यहां से बिजली का उत्पादन होता है, इसलिए यह शहर रात के अंधेरे में बेहद खूबसूरत भी दिखने लगा है.

क्या खास है कहलगांव में

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हालांकि इस शहर का महत्व एनटीपीसी से नहीं है. यह शहर कालांतर से धार्मिक केन्द्र भी रहा है. खासकर तंत्र साधना के जानकार इस शहर को काफी महत्व देते हैं. अब यह श्रद्धालुओं का भी केन्द्र बनता जा रहा है. मैं काफी दिनों तक इस शहर में रहा हूं. यहां से थोड़ा आगे यानी और पूर्व में विक्रमशिला नाम का स्थान है जहां विक्रमशिला विश्वविद्यालय स्थापित था. यह विश्वविद्यालय बौद्ध धर्म के वज्रयान शाखा का केन्द्र रहा है. वज्रयान ही बाद में चलकर तंत्रयान में बदल गया. यह इलाका तंत्र साधकों का इलाका है.

कहलगांव का शांतिधाम

कहलगांव में गंगा दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है. उत्तरायणी गंगा का विशेष महत्व शास्त्रों में बताया गया है. गंगा नदी के ठीक बीच में एक बेहद मनोरम पहाड़ी द्वीप है. इस द्वीप को शांतिधाम के नाम से जाना जाता है. यह शांतिधाम देश-विदेश के लाखों पर्यटकों और श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया है. गंगा नदी के बीचों-बीच स्थित शांतिधाम पहाड़ी आज पर्यटन स्थल के रूप में विकसित होने की पूरी क्षमता रखता है, लेकिन इसे उस रूप में विकसित नहीं किया जा रहा है. 

Image source: kahalgaon.com
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खिंचे चले आते हैं पर्यटक

यह पहाड़ी अपने मनोरम दृश्य के कारण हर साल लाखों पर्यटकों को यहां आने के लिए बाध्य करती है. वहीं यहां स्थापित मंदिर और ब्रह्मलीन शांति बाबा की समाधि होने के कारण आस्था और विश्वास के सहारे बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी खिंचे चले आते हैं. इसके अलावा गंगा नदी के दूसरे किनारे प्राचीन विक्रमशिला विश्वविद्यालय के भग्नावशेष को देखने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक एवं बौद्ध धर्मावलंबी आते हैं.

नानकशाही पहाड़ी का इतिहास

यहां के बाद ये पर्यटक एक बार शांति धाम पहाड़ी तथा इससे सटी दो अन्य पहाड़ियों पर घूमने लिए अवश्य जाते हैं. यह पहाड़ी सिख श्रद्धालुओं के लिए भी आकर्षण का केंद्र है. पहाड़ी पर स्थित मंदिर में सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरू ग्रंथ साहिब स्थापित होने के कारण इसे नानकशाही के नाम से भी जाना जाता है.  स्थानीय लोगों का कहना है कि इस स्थल के पर्यटक स्थल के रूप में विकसित होने की पूरी क्षमता होने और स्थानीय स्तर पर लगातार मांग किये जाने के बावजूद सरकार की ओर से ध्यान नहीं दिया जा रहा है. 

विदेशों से भी आते हैं सैलानी

स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां ब्रह्मलीन शांति बाबा की पुण्यतिथि पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों के अलावा कनाडा, सिंगापुर और नेपाल से भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं. समय-समय पर यहां नगर पंचायल, कहलगांव की ओर से पहाड़ी तक पहुंचने के लिए नौका की निःशुल्क व्यवस्था की जाती है. लेकिन, बड़ी संख्या में जुटने वाले श्रद्धालुओं के गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचने के लिए और व्यापक इंतजाम किए जाने की जरूरत है.

Image source: kahalgaon.com
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सरकार को देना होगा ध्यान

धाम एवं आश्रम का संचालन करने वाले शांति बाबा के शिष्य केदार शर्मा उर्फ केदार बाबा बताते हैं कि वर्ष 1900 में राजस्थान के झंझनू जिले में जन्मे शांति बाबा के बचपन का नाम वंशीधर था. उन्होंने पहाड़ी पर आकर वर्षों तक कठोर तपस्या की और अंततः समाधिस्थ हो गये. उनके अनुयायियों, श्रद्धालुओं और पर्यटकों की यहां भारी भीड़ होती है. साथ ही इसकी प्राकृतिक छटा इसे मनोरम बनाता है. ऐसे में सरकार की ओर से यदि इन पहाड़ियों को पर्यटक स्थल की पहचान दी जाये तो बेहतर होगा. जानकारों की मानें तो बिहार में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं. ऐसे में एक स्थल शांतिधाम पहाड़ी एवं दो अन्य पहाड़ियां भी हैं, जिसे विकसित करने से स्थानीय लोगों को बड़ी सख्या में रोजगार के अवसर प्रप्त होंगे.

पर्यटन का विकास करना होगा

यदि यहां भी हरिद्वार के लक्षमण झूला की तरह एक झूला बनवाकर इसे विकसित किया जाए तो पर्यटन के दृष्टिकोण से यह स्थल काफी महत्वपूर्ण हो सकता है. इसके विकास के लिए केवल कदम उठाने की जरूरत है. इस क्षेत्र को बिहार का पर्यटन विभाग विकसित कर सकता है क्योंकि यहां पर दुनिया को दिखाने के लिए बहुत कुछ है. विक्रमशिला का विश्वविद्यालय है. शाह कुमारी की पहाड़ी है. यही नहीं आपको बता दूं कि जब शाहजहां का बेटा सूजा औरंगजेब के डर से आगरा से भागा तो वह भागलपुर के सूजागंज में रहने लगा. सूजागंज भागलपुर का सबसे व्यस्त बाजार है.

इतिहास की एक और कहानी

एक कथा यह भी है कि सूजा को पकड़ने और मारने के लिए अैरंजेब के जासूस भागलपुर तक चले आए तब सूजा अपने परिवार के साथ कहलगांव की पहाड़ियों में जाकर छुप गया. उसकी बेटी की मृत्यु शाह कुमारी की पहाड़ी पड़ हुई. सूजा के बारे में कहा जाता है कि वह शाहकुंड में जाकर मरा. शाह कुमारी की पहाड़ी को लोग भगवान शिव की पत्नी पार्वती के साथ भी जोड़ते हैं. वैसे यह पहाड़ी बेहद खुबसूरत पहाड़ी है. पहाड़ी की चोटी पर एक दरगाह है और एक भगवान का शिव मंदिर भी है. आप कभी जाएं तो ये तमाम चीजें वहां जरूर देखें.