Mp election 2018: मध्य प्रदेश में बीएसपी के दांव से मुश्किल में बीजेपी-कांग्रेस

पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि किस तरह से बसपा ने लगातार कांग्रेस की संभावित जीत वाली सीटों पर खेल बिगाड़ने का काम किया है. बुन्देलखंड, विंध्य और ग्वालियर-चंबल संभाग में बसपा का अच्छा प्रभाव माना जाता है.

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मध्य प्रदेश में इस बार कांग्रेस वापसी के इरादे से विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. सूबे में पार्टी के सभी बड़े नेताओं के जिम्मेदारियां तय कर दी गई हैं, हालांकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के मुकाबले कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद के लिए अब तक कोई चेहरा घोषित नहीं किया है.

लंबे समय बाद प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की कमान एक ऐसे नेता के हाथों में है जो वरिष्ठ होने के साथ ही सभी गुटों को साधने में भी सक्षम नजर आ रहा है. प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के बाद से कमलनाथ ज्यादातर समय भोपाल में ही बने रहे हैं और इस दौरान उनका पूरा फोकस संगठन और गठबंधन पर ही रहा है.

MP में कांग्रेस की गठबंधन पर नज़र 

प्रदेश अध्यक्ष पद की कमान संभालने के बाद से कमलनाथ ने संगठन के पदों पर नियुक्तियां लगभग पूरी कर दी हैं, लेकिन गठबंधन का सवाल अभी भी बना हुआ है. कमलनाथ का सबसे ज्यादा जोर बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन करने पर रहा है.

पिछले तीन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार का एक प्रमुख कारण क्षेत्रीय पार्टियों द्वारा वोट विभाजन रहा है. ऐसे में कांग्रेस मध्य प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व में गठबंधन के सहारे सत्ता में अपनी वापसी का रास्ता देख रही है.

कमलनाथ शुरुआत से ही बसपा से साथ गठबंधन को लेकर उतावले दिखाई देते रहे हैं और शायद उनकी इस अधीरता व मजबूरी को बसपा ने भांप लिया है. इसीलिए अब बसपा, कांग्रेस से गठबंधन के लिए अपनी शर्तों पर अड़ गई है.  

एमपी में क्षेत्रीय पार्टियों का बढ़ा महत्व 

मध्यप्रदेश में यह शायद पहला चुनाव होगा, जिसमें क्षेत्रीय पार्टियों की भूमिका को इतना महत्त्व दिया जा रहा है. परम्परागत रूप से यहां हमेशा से ही कांग्रेस और भाजपा दो ही पार्टियों का वर्चस्व रहा है, लेकिन इस बार क्षेत्रीय पार्टियां भी अपने तेवर दिखा रही हैं.

माना जा रहा है कि किसी एक पार्टी की चुनावी लहर ना होने से इस बार हार-जीत तय करने में सपा, बसपा और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसी पार्टियों की अहम भूमिका रहने वाली है. इधर आदिवासी संगठन “जयस” और आम आदमी पार्टी भी मैदान में हैं. 

मध्य प्रदेश में बसपा का पलड़ा भारी 

सभी क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे बड़ा खिलाड़ी बहुजन समाज पार्टी को माना जा रहा है. मध्य प्रदेश में 15 फीसदी से अधिक दलित आबादी है, जो कि परम्परागत रूप से कांग्रेस का वोट बैंक रही है. हाल के कुछ वर्षों में कांग्रेस से कट कर दलित वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा भाजपा और बसपा में शामिल हो चुका है. 

 

मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए 35 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं, जिसमें से वर्तमान में 27 सीट भाजपा के पास हैं. कांग्रेस एक बार फिर अपने इस पुराने वोट बैंक को साधना चाहती है.

 

इसी सन्दर्भ में कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया ने “कांग्रेस की सरकार बनने पर वर्तमान कार्यकारी अध्यक्ष सुरेंद्र चौधरी को भी उपमुख्यमंत्री बनाने की बात कही थी”. हालांकि कांग्रेस ये भी समझ रही है कि दलित वोटरों को दोबरा साधने में उसे बसपा की मदद लेनी होगी.

बसपा बिगाड़ती रही है कांग्रेस का खेल

पिछले तीन विधानसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि किस तरह से बसपा ने लगातार कांग्रेस की संभावित जीत वाली सीटों पर खेल बिगाड़ने का काम किया है. बुन्देलखंड, विंध्य और ग्वालियर-चंबल संभाग में बसपा का अच्छा प्रभाव माना जाता है.

Madhya Pradesh Congress. (Image Source: mpcongress.org)

 

पिछले चार विधानसभा चुनावों के दौरान बसपा ने लगातार करीब सात प्रतिशत वोट शेयर बनाए रखा है. वर्ष 2013 विधानसभा चुनाव के दौरान उसे 6.29 फीसदी वोट मिले थे.

जाहिर है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की संभावनाओं को प्रभावित करने के लिए बसपा के पास पर्याप्त वोट बैंक है. ऐसे में इस बार कांग्रेस कोई जोखिम ना लेते हुए बसपा के साथ गठबंधन को आतुर नजर आ रही है.

बसपा सभी सीटों पर लड़ेगी चुनाव 

लंबे समय से कांग्रेस और बसपा के बीच गठबंधन को लेकर चर्चा चल रही है, लेकिन अब तक संगठन को लेकर कोई सहमति नहीं बन सकी है. गठबंधन को लेकर दोनों पार्टियों के बीच लगातार अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है. हालांकि इन सब बातों के बीच प्रदेश बसपा अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही थी, जो कि कांग्रेस पर दबाव बनाने का एक पैंतरा है. 

कांग्रेस को इस समय बसपा के साथ की ज्यादा जरूरत है, विशेषकर उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे बुंदेलखंड, विंध्याचल और ग्वालियर-चंबल की सीटों पर. साल 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा को चार सीटें मिली थी जबकि 11 सीटों पर उसके प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे थे और करीब डेढ़ दर्जन सीटों पर वो तीसरे नंबर पर रही थी. इन स्थितियों में कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए चाहकर भी बसपा की भूमिका से इनकार नहीं कर सकती है.

कांग्रेस, बसपा गठबंधन बढ़ा सकता है भाजपा की मुसीबत 

मध्यप्रदेश में कांग्रेस के वोट शेयर में बसपा के करीब सात प्रतिशत के वोट शेयर को जोड़ दिया जाए, तो फिर यह गठजोड़ भाजपा के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है.

आंकड़े बताते हैं कि अगर 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बसपा मिलकर चुनाव लड़ते तो वे करीब 131 सीटें जीत कर सरकार बना सकते थे. इसी तरह से अगर दोनों पार्टियां वर्ष 2013 में मिलकर चुनाव लड़तीं तो मुकाबला काफी करीबी हो सकता था.

पिछले तीन चुनावों के आंकड़े 

मप्र में पिछले तीन विधानसभा चुनाव के दौरान तीनों पार्टियों के वोट प्रतिशत पर नज़र डालें तो वर्ष 2003 में भाजपा को 45.50, कांग्रेस को 31 .61 और बसपा को 7.26  फीसदी मत मिले थे.

विधानसभा चुनाव 2008 की बात करें तो भाजपा को  37.64, कांग्रेस 32.39 और बसपा ने 8.97 वोट हासिल की थी. वहीँ वर्ष 2013 में 44.88 प्रतिशत, कांग्रेस ने 36.38 और बसपा ने 6.29 फीसदी वोट पाए थे. 

भाजपा को सत्ता से बेदखल करने की तैयारी

यदि इस बार कांग्रेस और बीएसपी मिलकर चुनाव लड़े तो पंद्रह साल से सत्ता में बैठी भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकती हैं. क्योंकि दोनों को मिलने वाले कुल वोट आंकड़ा भाजपा को मिलने वाले वोटों के बहुत करीब है. कांग्रेस को एहसास हो गया है कि भाजपा की सत्ता उखाड़ने के लिए उसे बसपा का साथ ज़रूरी है.

वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने स्वीकार किया है कि “आगामी मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करने से कांग्रेस को मदद मिलेगी”.

हालांकि कांग्रेस, बसपा के बीच गठबंधन नहीं हुआ तो जहां कांग्रेस को इसका नुकसान उठाना होगा, वहीं भाजपा को इससे काफी राहत मिलेगी. कांग्रेस से जुड़े अखबार नेशनल हेराल्ड में मध्य प्रदेश चुनाव को लेकर जुलाई में स्पीक मीडिया नेटवर्क का एक सर्वे प्रकाशित किया गया था, जिसमे कांग्रेस और बीएसपी के बीच गठबंधन नहीं होने पर भाजपा को सत्ता से हटाना बहुत मुश्किल होने की बात कही गई थी. 

तीन राज्यों में गठबंधन चाहती है बसपा

बसपा चाहती है कि उसका मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ तीनों ही राज्‍यों में कांग्रेस के साथ तालमेल हो जाए. राजस्थान में कांग्रेस की इकाई विशेषकर सचिन पायलट का खेमा इसके लिए तैयार नहीं हैं.

इस संबंध में वे सावर्जनिक बयान भी दे चुके हैं कि राजस्थान में कांग्रेस को किसी गठबंधन की आवश्यकता नहीं है और कांग्रेस अकेले ही चुनाव में उतरना चाहिए. इधर बसपा इन तीनों ही चुनावी राज्‍यों में कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर अड़ी हुई है.

सीटों के बंटबारे पर भो मतभेद 

सीटों के बंटवारे को लेकर भी बसपा और कांग्रेस में मतभेद बने हुए हैं.  इस बारे में बसपा प्रमुख मायावती ने  खा कि “कांग्रेस के साथ गठबंधन तभी होगा जब हमें सम्मानजनक सीटें मिलेंगी”. मध्य प्रदेश में कांग्रेस बसपा को 15 सीटें देना चाहती है, लेकिन बसपा 30 सीटें मांग रही है.

दरअसल मध्य प्रदेश में कांग्रेस अन्य पार्टियों के साथ भी गठबंधन की फिराक में है. ऐसे में वो चाहकर भी बसपा को ज्यादा सीटें नहीं दे सकती है.

(इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं. India-reviews.com यहां प्रकाशित होने वाले लेख और प्रकाशित व प्रसारित अन्य सामग्री से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है. आप भी अपने विचार या प्रतिक्रिया हमें editorindiareviews@gmail.com पर भेज सकते हैं.)

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