ओरांगुटान: अतीत से सीखते हैं खतरे को भांपना

दुनिया भर के जितने भी पशु और पक्षी हैं, उनको प्रकृति के खतरों का आभास पहले ही हो जाता है. वो आने वाले प्रकृतिक खतरों के साथ ही अपने आसपास के अन्य खतरों को भी भांप लेते हैं. सभी जानते हैं कि कई स्तनधारी व पक्षी शिकारी या खतरे को देख अपने साथियों को भी चेतावनी भरे स्वर में सचेत कर देते हैं. मगर ओरांगुटान में एक नई क्षमता की खोज की गई है.

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दुनिया भर के जितने भी पशु और पक्षी हैं, उनको प्रकृति के खतरों का आभास पहले ही हो जाता है. वो आने वाले प्रकृतिक खतरों के साथ ही अपने आसपास के अन्य खतरों को भी भांप लेते हैं. सभी जानते हैं कि कई स्तनधारी व पक्षी शिकारी या खतरे को देख अपने साथियों को भी चेतावनी भरे स्वर में सचेत कर देते हैं. मगर ओरांगुटान में एक नई क्षमता की खोज की गई है.

ओरांगुटान पहचानते हैं खतरा 

ओरांगुटान एक विकसित बंदर है, जो जीव वैज्ञानिकों के अनुसार वनमानुषों की श्रेणी में आता है. ओरांगुटान किसी शिकारी को देखते हैं तो चुंबन जैसी आवाज़ निकालते हैं. इससे शिकारी को यह सूचना मिल जाती है कि ओरांगुटान ने उन्हें देख लिया है. साथ ही अन्य ओरांगुटान को पता चल जाता है कि खतरा आसपास ही है.

केटांबे जंगल में अध्ययन 

सेन्ट एंड्रयूज़ यूनिवर्सिटी के एक पोस्टडॉक्टरल छात्र एड्रियानो राइस ई-लेमीरा ने ओरांगुटान की इन्हीं चेतावनी भरी आवाजों का अध्ययन सुमात्रा के घने केटांबे जंगल में कियाउन्होंने एक आसानसा प्रयोग करते हुए अपने साथी वैज्ञानिक को बाघ जैसी धारियों, धब्बेदार या सपाट पोशाक पहनकर चौपाए जानवर की तरह चलकर एक पेड़ के नीचे से गुज़रने को कहा.

इस पेड़ पर 5-20 मीटर की ऊंचाई पर मादा ओरांगुटानें बैठी हुई थीं. जब पता चल जाता कि उसे देख लिया गया है तो वह वैज्ञानिक 2 मिनट और वहां रुकता और फिर गायब हो जाता था. इतनी देर में ओरांगुटान को चेतावनी की पुकार उत्पन्न कर देना चाहिए थी.

पहला परीक्षण एक उम्रदराज़ मादा ओरांगुटान के साथ किया गया. उसके पास एक 9-वर्षीय बच्चा भी था, मगर इस परीक्षण में ओरांगुटान ने कोई आवाज़ नहीं की. वह जो कुछ भी कर रही थी, उसे रोककर अपने बच्चे को उठाया और मल त्यागा, जो कि बेचैनी का एक लक्षण है और पेड़ पर और ऊपर चली गई.

एक घंटे तक चीखी 

लेमीरा और उनके सहायक बैठेबैठे काफी देर तक इंतजार करते रहे. पूरे 20 मिनट बाद उम्रदराज़ मादा ओरांगुटान ने पुकार लगाना शुरू किया. वह एक बार चीखकर चुप नहीं हुई बल्कि पूरे एक घंटे तक लगातार चीखती ही रही. हालांकि औसतन ओरांगुटान को चेतावनी पुकार लगाने में करीब सात मिनट का विलंब हुआ.

बचाव के पहलू पर नज़र 

खतरे को भांपने के बाद ओरांगुटान ने आवाज न लगाकर बचाव की योजना पर काम शुरू किया जैसे कि बच्चों को एकत्र कर पेड़ पर ऊपर चढ़ना आदि. लेमीरा का ख्याल है कि ये मादाएं इसलिए खामोश रहीं ताकि उनके बच्चे सुरक्षित रहें.

क्योंकि उन्हें लगता है कि शिकारी से सबसे ज़्यादा खतरा बच्चों के लिए होता है. जब शिकारी नज़रों से ओझल हो गया और वहां से चला गया, तभी उन्होंने आवाज़ लगाई. लेमीरा का मत है कि चेतावनी पुकार को वास्तविक खतरा टल जाने के बाद निकालना अतीत के बारे में बताने जैसा है. उनके मुताबिक यह भाषा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है कि आप अतीत और भविष्य के बारे में बोलते हैं.                                                                                  (स्रोत फीचर्स)

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