15 अगस्त 2018: कहां गया जन का भारत?

जिस आजादी और संप्रभुता को पाने के लिये जन ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया हो, वही जन आज आजादी के 72वे बरस में उसके जश्न को दूर खड़ा निहार रहा है. सोच रहा है आजादी तो अमीरों के बस की बात है. उसकी हैसियत ही कहां है? आजादी के लिये शामिल होने की?

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19वी शताब्दी के उदय के साथ ही तीन शब्द जन -जन के हृदय में बसे रहे -स्वतंत्रता एसमानता और संप्रभुता. आज हम इक्कीसवीं शताब्दी के मध्य पहुंच चुके हैं. आजादी अपने 71 बरस की हो चुकी है. मुझे अपने बचपन के दिनों में मनाये जाते गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस की अच्छी तरह से याद है जिसमें शामिल होते वक्त बच्चों के दिलों में राष्ट्र के गौरव और गर्व की भावनाएं हिलोरे लेती थी. राष्ट्र भक्ति के तराने और गाथाएं बच्चों की जुबान पर चढी होती. स्कूलों को झण्डियों से सजाया जाता.

चूने की लकीरें डाली जाती. कतार बनाकर मैदानों में बच्चे पूरे उत्साह से स्वतंत्रता के जश्न का आनंद मनाते. बुजुर्गों की जुबानों पर अंग्रेजों के जुल्मों की दास्तानें होती. अण्डमान और निकोबार कालापानी के नाम से अपनी भयावहता से लोगों के दिलों मे बनाये हुए थे.

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ये आजादी अगस्त के महीने के शुरू होने से लेकर 15 अगस्त मन जाने तक जुनून की तरह दिलों में छायी रहती. फिर भी एक अहसास मन में समाया रहता आजाद होने का आजादी का. खादी पहने लोग जिन्होंने आजादी के लिबास की तरह अपने जिस्म को खादी से सजा लिया.

आज वैसी देश् निष्ठा और राष्ट्र समर्पण की कमी हमें चारों ओर दिखाई देती है. आजादी एक आव्हान था. स्वतंत्रता दिलों की पुकार बन चुकी थी. ऐसे आव्हान की ऐसे व्यक्तित्व की कमी आज हमारा देश् महसूस कर रहा है. आज तकनीक ने हमारे सच को हमारे अहसासों कोए हमारी भावनाओं को आभास और आडम्बर में बदल दिया है.

देश् के स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस केवल औपचारिक ओैर शासकीय रस्म बनकर रह गये हैं. इन दिवसों पर आमजन की उपस्थिति को आतंकी हमलों के भय ने खत्म कर दिया. प्रशासन जन सैलाब को उसके उत्साह को एजूनून को संभालने में सक्षम नहीं है.

सरकारी तंत्र जनता को भीड से अधिक कुछ नही मानता .उसकी उपस्थिति अव्यवस्थाओं को बढ़ाने वाली होती है, इसलिये प्रशासन सावधानी के लिए जनता को उन मैदानों भवनों और सभास्थलों से दूर रखती है जहां स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस मनाये जाते हैं. उसकी निगाह में जनता की हैसियत मुआवजों पर जिन्दगी गुजारने वालों से अधिक कुछ नहीं. ना जन के लिये सम्मान है ना उन पर तंत्र का तवज्जों ही बचा है.

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ऐसे में हमारी आजादी और गणतंत्र सरकारी औपचारिकता और दिखावे के हिस्से में सिमट गये. जन-गण-मन में से जन और मन निकाल दिये. कुछ बचा तो बस गण याने तंत्र.

आजादी एक आव्हान बनकर जन के मन में उतर कर आई थी. जिसके लिये जन ने अपने व्यक्तिगत अहसासों, भावनाओं अरमानों और एवज में मिलने वाली सुकून और ऐशो आराम और आर्थिक हानि की भी परवाह नही की. घर-परिवार छोड़ दिए और नौकरियां छोड़ दी.

इधर, निजी स्वार्थ और हित ने आजादी की दीवानगी ने सोचने-विचारने का ख्याल ही नही आने दिया. जिस आजादी और संप्रभुता को पाने के लिये जन ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया हो, वही जन आज आजादी के 72वे बरस में उसके जश्न को दूर खड़ा निहार रहा है. सोच रहा है आजादी तो अमीरों के बस की बात है. उसकी हैसियत ही कहां है? आजादी के लिये शामिल होने की?

आजादी के साथ ही लगी लगाई ही विभाजन की त्रासदी भी देश् को सहनी पड़ी. 200 साल के अंग्रेजी शासन ने भारत को उतना ध्वस्त नही किया जितना विभाजन की अमानवीयता और वहशियाना हरकतों ने निचोड़ के रख दिया. आपस में जमा विश्वास भरोसे की बुनियाद हिल गई.

आजाद भारत की सत्ता संभालने के लिये राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और साजिशें होने लगी. गांधी जी ने जिस आजादी को अंअहिंसा से पायी और जनता को दिलाई. वही आजादी विभाजन की त्रासद और अमानवीय घटनाओं के कारण हिंसक हो गई.

सत्ता पाकर राज करने की इच्छा बल पकड़ने लगी. विभाजन का ये सिलसिला केवल हिन्दुस्तान -पाकिस्तान पर ही नहीं रुका. हिन्दुस्तान के भीतर हिन्दुस्तान के जितने टुकडे हुए वह हर सोचने- विचारने वाले को भीतर तक हिला देने वाला है. विभाजन के साथ ही भारत और इण्डिया का विभाजन हुआ. इण्डिया के बाशिंदों में भारत को पाने की होड़ मची. वे कामयाब भी हुए.

एक राजनीतिक माफिया देश् में सक्रिय हुआ जिसने गांंधी जी की हत्या जैसे जघन्य कृत्य को अंजाम दिया. गांधी जी की हत्या के बाद इण्डिया के बाशिंदो यानी पश्चिमी सोच रखने वालों की राजनीति की शुरुआत हुई. धीरे-धीरे राजनीतिक माफिया देश् की राजनीति पर काबिज होने में सफल रहा. विभाजन के बाद देश् ने एक बडा बदलाव नब्बे के दश्क के साथ ही महसूस किया.

जब विश्व नीति में भू-मंडलीकरण के नाम पर खुले द्वार की नीति का प्रारम्भ हुआ. इण्डिया आगे बढा और भारत पीछे छूट गया. भारत और इण्डिया की विभाजक रेखायें साफ-साफ समाज के भूगोल पर उभर आई. अब सरकारें अपने बने रहने के लिये भारत की जनता को खैरात पर जीने के नुस्खे दे रही है. मध्यवर्ग आजीविका की तलाश् में खानाबदोश् बना हुआ है. ऐसे में स्वतंत्रता एक जश्न अधिक कुछ नही हो सकती.

आज इण्डिया के दुख दर्द मिटाने के लिए तंत्र सक्रिय है. गांधी जी की समग्र चिंता भारत के जन के साथ जुड़ी हुई थी. खुले द्वार की नीति ने जन को पीछे धकेल दिया. तंत्र आगे आया. धन ने तंत्र के विचार बदले. पश्चिमी विकास का मॉडल सामने आया जो कि भारतीय भू-आधारों के प्रतिकूल साबित हुआ.

सरकारें सन 1764 की स्थितियों में पहुंच गई. जो अग्रेजों की ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सामने अपनी संप्रभुता के सौदे कर रही थी. आज तंत्र है.

देश् की सम्प्रभुता संकटों से घिरी है. भीड़ न्याय कर रही है. व्यवस्था तमाशबीन बनी भीड़ का हिस्सा बन गई. न्याय व्यवस्था अपने आदेशों से शासनतंत्र को दिशा देने का प्रयास कर रही है. तंत्र अपने को सत्ता पर बनाये रखने के लिये कूट रचना कर रहा है.

विश्व बैंक ने अपनी सहायता की पोटली इण्डिया के शासनतंत्र के लिये उदारता से खोल रखी है. भारतवासी कर्जदार बने जीवन यापन के लिये जद्दोजहद में फंसे हैं. विश्व व्यवस्था ने सरकारी संस्थानों में रोजगार के द्वार बंद करा रखे हैं. वर्ल्ड बैंक के संकेतों पर पूरा तंत्र निश्चिंत होकर चल रहा है.

ये है भारत के तंत्र की दशा. भू-मंडलीकरण ने तंत्र की गति तेज कर दी, लेकिन भारतवासियों को उनके इतिहास बोध से दूर कर दिया. उनके साहित्य की संवेदनशीलता की भूमि बंजर बना दी गई.जन को लाभ हानि और घाटा मुनाफा के हिसाब किताब के फेर में उलझा दिया गया. देश् पर मर मिटने की हसरतें दिलों के भीतर ही भीतर कसमसाने लगी.

सीमाओं पर से सैनिकों के शव तिरंगों में लिपट कर आ जाते हैं जनता दुखी होती है. नम होती हैं आंखें. पर यह सब विकास के रास्ते पर बढते इण्डिया के लिये यह केवल एक दृष्य भर है.

सोशल मीडिया थोड़ी देर के लिये फिक्रमंद होता है, पर सब भूलकर फिर अपनी चुटकुलेबाजी की दुनिया में तरंगों पर तैरने लगता है. जनतंत्र जिन मजबूत कंधों पर टिका हुआ महसूस किया जाता है वह है प्रेस. लेकिन प्रेस? आज पूरी तरह से विश्व व्यवस्था के सामने झुका हुआ है.

आज के भारत के पास ना तो साहित्य और साहित्यकार की कोई कीमत बची है और ना ही उसके पास अपना इतिहास ही रहने दिया जा रहा है. नये-नये ढंग से इतिहास की बातें गढ़ी जा रही हैं. नया इतिहास रचा जा रहा है. नैतिकता के मानदंड खत्म किये जा रहे हों.

मर्यादा अपने मायने खो चुकी हो ऐसे समय में समाज जब अंधेरे में खडा अपनी तरक्की के सपने बुनने में लगा हो तब आजादी के जश्न में बाहर खड़े जन को पुकारने वाली आवाज तो अवाम को ही तलाशनी होगी?

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