भारतीय संस्कृति में क्यों आस्था के केंद्र हैं मंदिर

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तीर्थस्थल निर्मित नहीं होते. विकसित जरूर किए जा सकते हैं. विकास एवं विस्तार कार्य भी प्रभु की इच्छा से ही होता है और प्रभु की इच्छा से लोगों को तीर्थ निर्माण, विकास एवं विस्तार कार्यों में सहभागी होने का सौभाग्य मिलता है.

तीर्थ स्थलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को जानना जरूरी है. देश की एकता, अखंडता और समृद्धि में तीर्थस्थलों की सकारात्मक भूमिका रही है. देश की सभ्यता एवं संस्कृति का संरक्षण तीर्थ स्थल करते आए हैं.

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यही वजह है कि विदेशी आक्रमणकारियों ने सर्वप्रथम मंदिरों को ही अपना निशाना बनाया. उन्हें लूटा, तोड़ा, उनका विध्वंस किया.  सोमनाथ का उदाहरण आने वाले युगों तक आने वाली पीढि़यों को याद रखना होगा.

क्या लक्ष्य होता है मंदिरों का ?

मंदिर निर्माण का लक्ष्य राजनीतिक लाभ उठाने का नहीं होना चाहिए. नये निर्माण से पहले उन निर्माणों के संरक्षण की आवश्यकता है जिनका निर्माण भी सामूहिक प्रयासों से ही संपूर्ण हुआ था. गांव गांव में, शहरों में, महानगरों में आजादी के पहले निर्मित लाखों मंदिर हैं. कुछ छोटे छोटे हैं, कुछ बेहद भव्य और कुछ खंडहर में तब्दील हो चुके हैं. कुछ ज्यादा ही उपेक्षित हैं.

इनमें से अधिकांश मंदिर ऐसे भी हैं जहां संत, महात्माओं ने विश्राम किया था. सत्संग भी आयोजित किये थे. जन संचेतना प्रवाहित की थी. हमारे चारों धाम व अन्य प्रमुख तीर्थ भी दुनियां के लिए मिसाल हैं. अयोध्या भी एक मिसाल है. प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या पूरी दुनियां के लिए आकर्षण का केंद्र कल थी और आने वाले दिनों में रहेगी.

मथुरा, वृंदावन, काशी, सोमनाथ, इलाहाबाद, अमरकंटक, कन्याकुमारी सहित सैंकड़ों स्थान मार्गदर्शन केंद्र हैं. धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन ईश्वर के आदेशानुसार ही होते हैं और ईश्वरीय कृपा से ही सफलतापूर्वक संपन्न भी होते हैं. मंदिर पवित्र स्थल हैं.

धार्मिक आस्था के केन्द्र हैं. यहीं से आध्यात्मिक ज्ञान का प्रवाह समाज में प्रवाहित होती है. जन संचेतना प्रवाहित होती है और समाज में बंटे भागों को एकत्रित करती है. जोड़ने का कार्य मंदिर ही करते हैं.