कन्या लग्न के ग्रहों की स्थिति, सारगर्भित विवेचना

आकाश में 150 डिग्री से 180 डिग्री तक के भाग को कन्या राशि (Kanya lagna) के नाम से जाना जाता है. आकाश की इस समय सीमा के अंदर कोई व्यक्ति जन्म लेता है तो उसकी राशि कन्या (Kanya rashi) होती है. कन्या राशि का तत्व पृथ्वी है और इनका स्वामी बुध है. कन्या राशि के लोग व्यावहारिक, वफादार, मेहनती होते हैं.

आकाश में 150 डिग्री से 180 डिग्री तक के भाग को कन्या राशि (Kanya lagna) के नाम से जाना जाता है. आकाश की इस समय सीमा के अंदर कोई व्यक्ति जन्म लेता है तो उसकी राशि कन्या (Kanya rashi) होती है. कन्या राशि का तत्व पृथ्वी है और इनका स्वामी बुध है. कन्या राशि के लोग व्यावहारिक, वफादार, मेहनती होते हैं.

कन्या लग्न में चंद्र (Kanya lagna me chandra)

कन्या लग्न में चंद्र ग्यारहवे भाव का अधिपति होता है. ग्यारहवे भाव का अधिपति होने के कारण चंद्र लोभ, लाभ गुलामी, संतान हीनता, कन्या संतति, रिश्तेदार, रिश्वतखोरी, बेईमानी जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. इन विषयों की जानकारी के लिए आपको कुंडली में चंद्र के स्थान का अध्ययन करना चाहिए.

कन्या लग्न में सूर्य (Kanya lagna me surya)

कन्या लग्न में सूर्य बारहवे स्थान का अधिपति होता है. बारहवे स्थान का अधिपति होने के कारण सूर्य निद्रा, यात्रा, हानि, दान, व्यय, दंड, विदेश यात्रा, भोग ऐश्वर्य, लंपटगिरी, परस्त्री गमन, व्यर्थ भ्रमण जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. जातक को इन सभी में शुभ फल पाने के लिए अपनी कुंडली में सूर्य के स्थान का अध्ययन तथा सूर्य के उपाय करने चाहिए.

कन्या लग्न में मंगल (Kanya lagna me mangal)

कन्या लग्न में मंगल तीसरे और आठवे भाव का अधिपति होता है. तीसरे भाव का अधिपति होने के कारण मंगल नौकर, चाकर, सहोदर, अभक्ष्य पदार्थों का सेवन, क्रोध, भ्रम लेखन, कंप्यूटर, मोबइल, अकाउंट्स, पुरूषार्थ, साहस, शौर्य, दासता, योगाभ्यास जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. वहीं इसके आठवे भाग के अधिपति होने के कारण ये व्याधि, जीवन, आयु, मृत्यु का कारण, मानसिक चिंता, समुद्र यात्रा, नास्तिक विचारधारा, ससुराल, दुर्भाग्य, दरिद्रता, आलस्य, जेलयात्रा, अस्पताल, भूत-प्रेत, जादू-टोना जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है.

कन्या लग्न में बुध (Kanya lagna me budh)

कन्या लग्न में बुध पहले और दसवे स्थान का अधिपति होता है. पहले स्थान का अधिपति होने के कारण बुध आपके रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख-दुख, विवेक, मस्तिष्क, व्यक्ति के स्वभाव, आकृति और उसके संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है. वहीं बुध के दसवे स्थान पर होने के कारण ये राज्य, मान प्रतिष्ठा, कर्म, पिता, प्रभुता, व्यापार, अधिकार, ऐश्वर्य भोग, कीर्तिलाभ, नेतृत्व, विदेश यात्रा, पैतृक संपत्ति जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है.

कन्या लग्न में गुरू (Kanya lagna me guru)

कन्या लग्न में बृहस्पति चैथे भाव का अधिपति होता है. चैथे भाव का अधिपति होने के कारण गुरू भूमि भवन, वाहन, मित्र, साझेदारी, शांति, जल, जनता, स्थायी संपत्ति, दया, परोपकार, छल-कपट, अंतकरण की स्थिति, जलीय पदार्थों का सेवन, धन संचय, झूठा आरोप, अफवाह, प्रेम संबंध, प्रेम विवाह जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है.

कन्या लग्न में शुक्र (Kanya lagna me shukra)

कन्या लग्न में शुक्र दूसरे और नवे भाव का अधिपति होता है. दूसरे स्थान का अधिपति होने के कारण शुक्र कुल, आंख, नाक, कान, गला, स्वर, आभूषण, सौंदर्य, गायन कुटुंब का प्रतिनिधित्व करता है. वहीं नवे भाव का अधिपति होने के कारण शुक्र धर्म, पुण्य, भाग्य, गुरू, ब्राह्ममा, देवता, तीर्थ यात्रा, भक्ति, मानसिक वृत्ति, भाग्योदय, पिता का सुख, तीर्थ यात्रा, दान, इत्यादि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है.

कन्या लग्न में शनि (Kanya lagna me shani)

कन्या लग्न में शनि पांचवे और छठे भाव का अधिपति होता है. पांचवे भाव का अधिपति होने के कारण शनि बुद्धि, आत्मा, स्मरण शक्ति, विद्या ग्रहण करने की क्षमता, शक्ति नीति, आत्मविश्वास, प्रबंध कुशलता, देव भक्ति, देश भक्ति, नौकरी का त्याग, धन मिलने के उपाय, अनायास धन मिलने की संभावना, व्रत, पुत्र संतान, स्वाभिमान, अंहकार आदि विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. छठे भाव का अधिपति होने के कारण शनि बीमारी, कर्ज, दुश्मन, चिंता, शंका, पीड़ा, ननिहाल, असत्य भाषण, योगाभ्यास, जमींदारी, साहूकारी, वकालत, व्यसन, ज्ञान, अच्छा या बुरा व्यसन जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है.

कन्या लग्न में राहु (Kanya lagna me raahu)

कन्या लग्न में राहु प्रथम भाव का अधिपति होता है. प्रथम भाव का अधिपति होने के कारण राहु आपके रूप, चिन्ह, जाति, शरीर, आयु, सुख-दुख, विवेक, मस्तिष्क, व्यक्ति के स्वभाव, आकृति और संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है. इन विषयों में कभी भी जानने के लिए कन्या लग्न के जातक को अपनी कुंडली में राहु के स्थान के बारे में अध्ययन जरूर करना चाहिए.

कन्या लग्न में केतु (Kanya lagna me ketu)

कन्या लग्न में केतु सातवे भाव का अधिपति होता है. सातवे भाव का अधिपति होने के कारण केतु स्त्री, कामवासना, चोरी, झगड़ा, अशांति, उपद्रव, अग्निकांड जैसे विषयों का प्रतिनिधित्व करता है. केतु की बलशाली स्थिति आपको इन विषयो में शुभ फल देती है. वहीं कमजोर स्थिति अशुभ फल देती है.

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