Natural disasters: क्या मानव की गलतियों का परिणाम हैं प्राकृतिक आपदाएं?

प्राकृतिक आपदा एक ऐसा शब्द जिसकी भयावहता से केवल हमारा देश ही नहीं बल्कि दुनिया का शायद की कोई देश अब तक बचा हो. प्राकृतिक आपदाएं आंधी, तूफ़ान, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़ और भूकंप के साथ ही और न जाने किस-किस रूप में दुनिया को झकझोर चुकीं हैं. प्रकृति के प्रकोप का एक बड़ा उदाहरण हमारे सामाने केरल के रूप में खड़ा दिखाई देता है.  

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प्राकृतिक आपदा एक ऐसा शब्द जिसकी भयावहता से केवल हमारा देश ही नहीं बल्कि दुनिया का शायद की कोई देश अब तक बचा हो. प्राकृतिक आपदाएं आंधी, तूफ़ान, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़ और भूकंप के साथ ही और न जाने किस-किस रूप में दुनिया को झकझोर चुकीं हैं. प्रकृति के प्रकोप का एक बड़ा उदाहरण हमारे सामाने केरल के रूप में खड़ा दिखाई देता है.  

क्या प्रकृति प्रकोप के लिए मानव है जिम्मेदार 

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प्राकृतिक आपदाओं के लिए काफी हद तक मानव स्वंय ही जिम्मेदार है. इंसान अपने स्वार्थ में अंधा होकर प्रकृति का अधिक से अधिक दोहन करने में लगा हुआ है. इस कारण पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंच रहा है. जिसके फलस्वरूप मानव जाति को प्राकृतिक आपदाओं सामना करना पड़ रहा है. वहीं कुछ आपदाएं प्राकृतिक ही होती हैं.

प्राकृतिक आपदाओं से बचने अपनाएं सही उपाय 

प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए सही उपाय अपनाने की जरूरत है. इन आपदाओं से लिए जहां एक-तरफ प्रकृति को समृद्ध बनाने के लिए प्रयास करने चाहिए. तो दूसरी ओर इंन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण भी आपदाओं को ध्यान में रखकर ही कराना चाहिए. जिससे अगर किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा आती भी है तो उससे ज्यादा नुकसान न हो. साथ ही मौसम वैज्ञानिकों को अपडेट रहना होगा. जिससे कि सही और सटीक खबरें दे सकें.

जनभागीदारी से करें प्राकृतिक संरक्षण के प्रयास

वन और मृदा के संरक्षण के लिए हमें सिर्फ सरकारी नीतियों पर ही निर्भर नहीं रहना है. इस काम के लिए सरकार पर ही नहीं रहना, बल्कि जनभागीदारी से कार्य करना होगा. जल संरक्षण और हरियाली बचाने के लिए हमें सबसे अधिक प्रयास करने होंगे.

इसके साथ ही जल संरक्षण के साथ मिट्टी की नमी का संरक्षण भी करवाएं. जिन क्षेत्रों में जो पौधे आसानी से पनपते हैं उन्हें ही लगाना चाहिए. इससे पौधों की देख-रेख पर विषेष ध्यान नहीं देना होगा. यही कारण है कि जिन गांवों में हरियाली ज्यादा होती है, वहां प्राकृतिक आपदा आने का खतरा भी काफी कम होता है.

पर्यावरण सुरक्षा के लिए जरूरी है रक्षा नीति 

हमें पर्यावरण की चुनौतियों से बचने के लिए सभी प्रकार की आपदाओं से निपटने के लिए पर्यावरण रक्षा नीति अपनानी होगी. चाहे फिर क्षेत्र कोई भी हो. इन सभी में पर्यावरण की रक्षा पर विषेष ध्यान देना होगा.

जब भी किसी शहर या गांव में मूलभूत सुविधाओं के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण किया जाता है, तो आपदाओं से सामना करने के लिए पहले ही व्यवस्था करनी चाहिए. मौसम के बदलाव के इस दौर में असामान्य परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा. इसके लिए बजट भी तैयार रखना चाहिए. साथ ही अगर एक-जगह से दूसरी जगह जाने की नौबत आती है तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए.

सड़क निर्माण के समय हो जल निकासी व्यवस्था

हमारे आस-पास जब भी छोटी या बड़ी सड़क का निर्माण हो तो हमें जल निकासी की उचित व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए.  यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो इससे बाढ़ के वक्त जल-जमाव का खतरा अधिक हो जाता है. वहीं पहाड़ी क्षेत्र में ज्यादा पेड़ काटने और डायनामाइट का अधिक उपयोग करने से भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है. खासतौर पर उत्तराखंड और हिमाचल जैसे क्षेत्रों में इसका असर देखने को मिल रहा है.

सफाई पर दें ध्यान 

हमें अपने आस-पास स्वच्छता बनाए रखनी चाहिए. खासतौर पर पाॅलीथीन और प्लास्टिक के कचरे को पूरी तरह कम करने का प्रयास किया जाना चाहिए. इसके अलावा शौचालय बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि इनका डिजाइन ऐसा हो कि उससे भूजल के प्रदूषित होने की आशंका न हो.