फ़िल्मी दुनिया से बहुत अलग थे असली डायनासौर

डायनासौर, नाम सुनते ही हमारी आँखों के सामने "जुरासिक पार्क" फिल्म के हाथियों से भी दोगुनी काया के जीव घूमने लगते हैं. पृथ्वी से डायनासौर नामक इन विशालकाय जीवों का अस्तित्व तो 6.6 करोड़ वर्ष पूर्व ही समाप्त हो गया था. हालांकि "जुरासिक पार्क" मूवी देखने या कहीं से भी पढ़ने-सुनने के बाद इन दैत्य आकर जीवों के बारे में कई प्रश्न हमारे मन में उठते रहते हैं. 

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डायनासौर, नाम सुनते ही हमारी आँखों के सामने “Jurassic Park” फिल्म के हाथियों से भी दोगुनी काया के जीव घूमने लगते हैं. पृथ्वी से डायनासौर नामक इन विशालकाय जीवों का अस्तित्व तो 6.6 करोड़ वर्ष पूर्व ही समाप्त हो गया था. हालांकि “जुरासिक पार्क” मूवी देखने या कहीं से भी पढ़ने-सुनने के बाद इन दैत्याकार जीवों के बारे में कई प्रश्न मन में उठते हैं. 

विज्ञान की रोचक कथाओं और एनीमेशन फिल्मों के रूप में ‘जीवित’ इन डायनासौर के बारे में कई यक्ष प्रश्न अक्सर अंगड़ाई लेने लगते हैं. इनमे से कुछ प्रश्नों के उत्तर हमें जीव वैज्ञानिकों और जीवाश्म वैज्ञानिकों के प्रयासों से मिल गए हैं. 

Tyrannosaurus rex and dinosaur

‘आतंकी छिपकलियों का राजा’ कहलाने वाला टायरेनोसौरस रेक्स (टी.रेक्स) डायनासौर सभी प्रजातियों में सबसे बड़ा और मांसाहारी डायनासौर रहा है. बड़े आकार के सिर के माध्यम से यह डायनासौर बेहद मज़बूत जांघों और ताकतवर पूंछ का संतुलन करता था.

वर्ष 2011 में प्रकाशित एक शोध में बताया गया कि इन डायनासौर के शरीर की बनावट और उसका संतुलन इतना गज़ब का था कि इतनी विशाल देह को लेकर भी टी.रेक्स 20 से 40 किलो मीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकते थे.

टी.रेक्स की अगली टांगों में दो-दो उंगलियां भी थी, लेकिन अगली टांगें कमज़ोर थीं. टांगों की कमज़ोरी की भरपाई उन्होंने जबड़ों की बेहतर पकड़ से कर ली थी और वे बेहद सफल शिकारी रहे होंगे.

क्या है जीभ लपलपाने का राज 

कई पिक्चरों और मॉडल्स में टी.रेक्स की लपलपाती जीभ को देख मन में प्रश्न आता है कि क्या टी.रेक्स अपनी जीभ से बर्फ के गोलों और लालीपॉप्स को चूस सकते थे, जैसे कि हम करते हैं. क्या वे आइसक्रीम के कोन के किनारों से बहती-टपकती आइसक्रीम को चाटने का मज़ा ले सकते थे?

वैज्ञानिक मानते हैं कि टी.रेक्स ऐसा नहीं कर सकते थे, क्योंकि उनकी जीभ काफी हद तक निचले जबड़े से जुड़ी हुई थी. एक नए शोध ने डायनासौर के चित्र और मॉडल बनाने वाले विशेषज्ञों की कला में खामियों की विवेचना की है. वैज्ञानिकों का कहना है कि एनिमेटर्स टी.रेक्स को आधुनिक छिपकलियों के समान जीभ लपलपाते दिखाते हैं, जो कि एक दम गलत है. 

छिपकलियां करतीं हैं जीभ से शिकार

वैज्ञानिक मानते हैं कि सरिसृप परिवार में सांप और कुछ छिपकलियां जीभ बाहर निकालकर अनेक कार्यों को अंजाम देती हैं. सांपों की जीभ तो काफी लंबी तथा सिरे से दो भागों में विभाजित होती है. 

शिकार की गंध के कण हवा से पकड़कर लपलपाती जीभ उन्हें ऊपरी जबड़ों के समीप स्थित गंध संवेदी अंग जेकबसंस आर्गन में ले जाती है. कुछ गंध संवेदी तंत्रिकाएं इस अंग से मस्तिष्क में संदेश पहुंचा कर शिकार की पहचान बताने में मदद करती हैं. 

रेगिस्तान की कुछ छिपकलियों में तो जीभ मुंह से बाहर निकलकर अपनी आंखों की साफ-सफाई तक कर लेती हैं. इतना ही नहीं ये छिपकलियां गर्मी में थूक को माइस्चेराइज़र्स की तरह अपने शरीर पर भी लगा लेती हैं. 

टी.रेक्स नहीं लपलपाते थे जीभ

भले ही आधुनिक सरिसृप जीभ हवा में लहराने और अनेक कार्य करने में माहिर हैं, लेकिन भीमकाय टी.रेक्स ऐसा नहीं कर सकते थे. वैज्ञानिकों मानते हैं कि टी.रेक्स की जीभ और होंठ जैसे नरम अंग जीवाश्म नहीं बन पाते हैं और इसीलिए जीवाश्मीकरण की प्रक्रिया में बेहद आसानी से नष्ट हो जाते हैं. 

इसलिए वैज्ञानिकों को जीवाश्मित जीभ का तो नहीं है, लेकिन  जीभ को आकार देने वाली निचले जबड़े की छोटी व मज़बूत हड्डियों के समूह हयॉड (Hyoid) का अध्ययन अवश्य किया गया है.

पक्षियों और मगरमच्छ भी लपलपाते थे जीभ (Birds and crocodiles)

वैज्ञानिकों ने डायनासौर की हयॉड के साथ ही पक्षियों और मगरमच्छ जैसे डायनासौर के निकटतम रिश्तेदारों में भी जीभ लपलपाने की प्रवृत्ति को देखा है.

डायनासौर व मगरमच्छों की हयॉड हड्डियों की समानता के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला की डायनासौर की जीभ मगरमच्छों के समान ही निचले जबड़े के तालू में जुड़ी रही होगी और इसका बाहर निकलना संभव नहीं रहा होगा.

छिपकली जैसे नहीं थे डायनासौर 

कशेरुकी जीवाश्म शास्त्र की विशेषज्ञ प्रोफेसर जूलिया क्लार्क कहतीं है कि अधिकांश लोग डायनासौर की शरीर रचना और जीवनशैली को समझ नहीं पाते और उन्हें लपलपाती जीभ वाला दिखा देते हैं. 

चित्रकारों के मन में यह गलत धारणा बनी हुई है कि डायनासौर वर्तमान छिपकलियों जैसे ही थे. पृथ्वी पर डायनासौर के सबसे नज़दीकी रिश्तेदार पक्षी और मगरमच्छ परिवार के सदस्य हैं.

आधुनिक पक्षियों की जीभ विविधता से भरी व गतिशील है. पक्षियों में जीभ को अनेक कार्यों को करने व कई दिशाओं में मोड़ने की खूबी का मुख्य कारण जटिल हयॉड हड्डी है, जो जीभ के अगले सिरे तक आधार देने का कार्य करती हैं.

सामान नहीं है Tyrosaurus और Dinosaur का विकास 

वैज्ञानिकों का मानना है कि डायनासौर व मगरमच्छ परिवार के सदस्यों में हयॉड मात्र एक जोड़ीदार छोटी, सरल और छड़ के समान संरचनाएं हैं.

जो कि हयॉड उनकी पेशियों तथा संयुक्त करने वाले ऊतकों से पूरी लंबाई में आधार से जुड़ कर रहती है. उड़ने वाले टाइरोसौरस व आधुनिक पक्षियों में भी हयॉड हड्डी एक समान ही लगती है.

टाइरोसौरस व डायनासौर के उद्विकास को वैज्ञानिक भिन्न मानते हैं. हवा में उड़ने वाले टाइरोसौरस की लपलपाती जीभ भोजन के के कारण रही होगी.

वैसे भी आधुनिक मगरमच्छों की काटने तथा निगलने की प्रवृत्ति में लपलपाती जीभ का कोई खास कार्य नहीं है. इसलिए डायनासौर एवं मगरमच्छ अपने नज़दीकी रिश्तेदारों के समान जीभ को लपलपाकर चाटने की प्रक्रिया को अंजाम नहीं दे सकते थे. (स्रोत फीचर्स)

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