ज्योतिष में केतु ग्रह का महत्व और कुंडली के 12 भावों में केतु का महत्व

ज्योतिष में केतु एक बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रह है. इसे एक छाया ग्रह माना जाता है. ये अपने साथ बैठे ग्रह के अनुसार ही फल देता है.

कई लोग अपने भविष्य को जानने का प्रयास करते हैं और इसी प्रयास में वे ज्योतिषियों के पास चले जाते हैं. ज्योतिष आपकी कुंडली में मौजूद ग्रहों की चाल को देखते हुए आपके और आपके भविष्य के बारे में बता देते हैं. ज्योतिष के मुताबिक कुंडली में नौ ग्रह होते हैं और इन नौ ग्रहों में से एक ग्रह केतु है जो काफी महत्वपूर्ण ग्रह है.

केतु ग्रह

ज्योतिष में केतु एक बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रह है. इसे एक छाया ग्रह माना जाता है. ये अपने साथ बैठे ग्रह के अनुसार ही फल देता है. केतु कुंडली के किस भाव में बैठा है फल जानने के लिए ये जानना काफी महत्वपूर्ण हैं. केतु शुभ और अशुभ दोनों तरह के परिणाम देता है. हालांकि ज्योतिष में इसे क्रूर ग्रह माना जाता है.

केतु का महत्व

केतु एक अशुभ ग्रह है लेकिन जरूरी नहीं की ये हर बार हर व्यक्ति को बुरा फल दे. कई जातकों को इससे शुभ फल भी प्राप्त होते हैं. ज्योतिष में इसे अध्यात्म, वैराग्य, मोक्ष और तांत्रिक विद्या का कारक माना गया है. केतु किसी भी राशि का स्वामित्व नहीं करता है. इसकी उच्च राशि धनु है और निम्न राशि मिथुन है.

केतु का प्रभाव

केतु अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है. केतु के कारण जातक कठोर स्वभाव वाला तथा आक्रोशित होता है. केतु की कोई स्वामी राशि नहीं है इसलिए केतु जिस भी राशि में जाता है जातक को उसी के अनुसार परिणाम देता है. ज्योतिषियों का मानना है की केतु जातक को स्वभाव से साधू बनाता है और आध्यात्म की ओर ले जाता है.

कुंडली के 12 भावों में केतु का फल

कुंडली के पहले भाव में केतु का फल : पहले भाव में केतु मनुष्य को रोगी, चिंताग्रस्त, कमजोर बनाता है. मनुष्य खुद द्वारा की गई गलतियों से ही लड़ता रहता है. ये जातक चंचल, भीरु, दुराचारी होते हैं. इन्हें जीवनसाथी की चिंता लगी रहती है.

कुंडली के दूसरे भाव में केतु का फल : इसके कारण व्यक्ति सत्य को छुपाने वाला, अपनी वाणी के बल पर दूसरों को पराजित करने वाला होता है. इन्हें गला एवं नेत्र रोग हो सकता है. इन्हें पारिवारिक सुखों की कमी रहती है. ये आज्ञाकारी, धनवान तथा धार्मिक होते हैं.

कुंडली के तीसरे भाव में केतु का फल : इसके कारण व्यक्ति बुद्धिमान, धनी तथा विरोधियों का नाश करने वाला होता है. ये शास्त्रों के ज्ञाता, विवाद में रुचि रखने वाले तथा बलशाली होते हैं. इन्हें तीर्थ यात्रा का शौक होता है. अगर केतु अशुभ होता है तो ये हृदय रोगी, कर्ण रोगी रहते हैं.

कुंडली के चौथे भाव में केतु का फल : इन्हें माता का सुख कम मिलता है. ये अपने दोस्तों द्वारा भी अपमानित होते हैं. केतु के शुभ प्रभाव के कारण ये जातक ईमानदार, मृदुभाषी, धनी, प्रसन्न, दीर्घायु होते हैं.

कुंडली के पांचवे भाव में केतु का फल : केतु के पांचवे भाव में होने से व्यक्ति रोगी, निर्धन, निष्पक्ष, उदासीन तथा विभिन्न कष्टों को भोगने वाला होता है. ये भगवान में विश्वास रखने वाला तथा संतान सुख से युक्त होता है. इन्हें सन्यासी, शास्त्रों और तीर्थ यात्राओं में रुचि होती है.

कुंडली के छठे भाव में केतु का फल : ये जातक रोगमुक्त जीवन व्यतीत करते हैं. पशु प्रेमी होते हैं, विद्वानों के संग जीवन जीना पसंद करते हैं. इन्हें शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है. इन्हें गुस्सा तो बहुत आता है पर ये घर के बाहर कम दिखाते हैं.

कुंडली के सातवे भाव में केतु का फल : सातवे भाव में केतु के होने से जातक को जीवन में अपमान सहन करना पड़ता है. वो किसी सुंदरी के पीछे फालतू ही घूमता रहता है. ये बहुत सोने वाले, यात्रा की चिंता से मुक्त होते हैं.

कुंडली के आठवे भाव में केतु का फल : ये व्यभिचारी, चरित्रहीन और दूसरों की संपत्ति पर दृष्टि रखने वाले होते हैं. इन्हें वाहन चलाने से भय लगता है. ये जातक दूसरों के धन और दूसरों की स्त्री पर नजर रखते हैं.

कुंडली के नौवे भाव में केतु का फल : नौवे भाव में केतु के होने से मनुष्य को पुत्र तथा धन लाभ होता है. ये जातक पराक्रमी तथा शस्त्र धारण करने वाले होते हैं.

कुंडली के दसवे भाव में केतु का फल : दसवे भाव में केतु के होने से जातक को पिता का सुख मिलता है, स्वयं भाग्यवान होता है, शत्रुओं का नाश करनेवाला होता है. ये जातक बुद्धिमान, दार्शनिक, साहसी तथा दूसरों से प्रेम रखने वाला होता है.

कुंडली के ग्यारहवे भाव में केतु का फल : ग्यारहवे भाव में केतु के होने से जातक कठिन से कठिन समस्या का समाधान ढूंढ लेता है. इनका स्वभाव मधुर, दयालु और नम्र होता है. ये वाणी के धनी होते हैं और भाषण देने में पारंगत होते हैं. ये विद्वान, सुंदर और उत्तम शरीर वाले होते हैं.

कुंडली के बारहवे भाव में केतु का फल : बारहवे भाव में केतु विदेश यात्रा का संकेत देता है. ये जातक राजा की तरह खर्च करते हैं. इन्हें पाँवों और आँखों में कोई बीमारी होती है. ये अपने शत्रुओं को पराजित करने में माहिर होते हैं और मोक्ष के मार्ग को ढूँढने के लिए बैचेन रहते हैं.

केतु के उपाय

– भूरे रंग के वस्त्रों का प्रयोग करें.
– कुत्तों की सेवा करें.
– गणेशजी या मतस्य देव की पूजा करें.
– केला, तिल के बीज, काला कंबल, काले पुष्प का बुधवाक की शाम को दान करें.
– लहसुनिया रत्न धारण करें.
– 9 मुखी रुद्राक्ष धारण करें.
– ओम स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः मंत्र का जाप करें.

यंत्र – केतु यंत्र
मंत्र – ओम स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः
जड़ी – अश्वगंधा की जड़
रत्न – लहसुनिया
रंग – भूरा

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