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समाज और संस्‍कृति

देश की राजनीति में कब शामिल होगा पर्यावरण का मुद्दा?

अधिकांश राजनीतिक दलों के एजेंडे में पर्यावरण संबंधी मुद्दा है ही नहीं है, ना ही उनके चुनावी घोषणापत्र में पर्यावरण, प्रदूषण कोई मुद्दा रहता है.
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गुम होता बचपन, स्मृतियों के गुब्बारे और थोड़े बच्चे…!

अब बच्चों बचपन टीवी देखने, स्कूल के बोझ और काल्पनिक कहानियों तले दुबककर रह गया. यूं तो हर माता-पिता का अदना से ख्वाब रहता है कि वह अपनी आने वाले बच्चों को बेहतर जीवन दे सकें, लेकिन हम उन्हें बेहतर बचपन देने में नाकाम है. बचपन के हर बागान…
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देश के इस शहर में औरतेें कैद हैं एक अलग ही दुनिया में..!

यहां की आम औरतें, जो आपको चाय के होटलों पर चाय बनाते, गुटखा-पान की दुकानों पर रसदार पान बनाते हुए या फिर फुटपाथ पर खाने के छोटे-छोटे स्टॉलों पर खाना खिलाते मिल जाएंगी.
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गौहर की नज़्में उस ख़्वाब का हिस्सा हैं, जो हमने आज़ादी के वक़्त देखा था: शर्मीला

कवि और सुपरिचित फिल्मकार गौहर रज़ा की सद्य प्रकाशित नज़्म पुस्तक 'खामोशी' का लोकार्पण इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुआ. पुस्तक के प्रकाशक राजपाल एंड संज द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया
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‘छबीला रंगबाज’ चरित्रहीन परिवेश की कहानियों का शहर..

हिंदी के प्रसिद्ध प्रकाशक राजपाल एण्ड सन्ज़ द्वारा आयोजित इस लोकार्पण समारोह में युवा आलोचक संजीव कुमार ने छबीला रंगबाज का शहर को यथार्थ के गढ़े जाने का पूरा कारोबार बताने वाला संग्रह बताया.
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महंगी होती शिक्षा प्रणाली और स्कूलों में असुरक्षित बच्चे

अंग्रेजी भाषा के पब्लिक स्कलों में जब दाखिला लेना होता है, तो हर अभिभावक के जेहन में सुरक्षा को लेकर सवाल उमड़ने लगता है. इस मसले पर जब स्कूल प्रशासन से मंत्रणा की जाती है, तो उस स्थिति में पब्लिक स्कूलों के मालिक सुरक्षा की दुहाई सीसीटीवी…
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क्या समाज में होंगी ऐसी शादियां? मिल पाएगा समाज को ये जरूरी अधिकार?

कंचना माला और मोइदीन का प्यार हमारे दौर का एक ऐसा मिसाल है, जिसका जिक्र फसानों में भी नहीं मिलता है. यह मोहब्बत का ऐसा जादू है जिस पर यकीन करना मुश्किल हो जाए कि क्या कोई किसी से इस कदर टूट कर भी प्यार कर सकता है? यह अपने प्यार के लिए खुद…
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनकी संत परंपरा

गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर महंथ आदित्यनाथ वैसे रहने वाले तो उत्तराखंड के हैं लेकिन वे जिस संत परंपरा से आते हैं, उसका इस देश की सांस्कृतिक संरचना में व्यापक योगदान है.
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क्या होगा जब नहीं रहेगी समाज में लड़कियांं? शर्मसार करती है रिपोर्ट

हम एक लिंगभेदी मानसिकता वाले समाज हैं, जहां लड़कों और लड़कियों में फर्क किया जाता है. यहां लड़की होकर पैदा होना आसान नहीं है और पैदा होने के बाद एक औरत के रूप में जिंदा रखना भी उतना ही चुनौतीपूर्ण है.
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